भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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सेवा-धर्म बड़ा कठिन है। हजारों प्रकारकी सेवायें करने, अनेक प्रकार की हाँ-में-हाँ मिलाने, दिनको रात और रातको दिन कहने, तरह-तरहकी खुशामदे करनेसे भी मालिक कभी सन्तुष्ट नहीं होता। राजाओंके दिल अशिक्षित घोड़ोंकी तरह चंचल होते हैं। उनके चित्त स्थिर नहीं रहते; ज़रासी देरमें वे प्रसन्न होते और ज़रासी देरमें अप्रसन्न हो जाते हैं; क्षणभरमें गाँव-के-गाँव बरुशते और क्षण-भरमें शूली पर चढ़वाते हैं, इसलिये राजसेवामें बड़ा ख़तरा है। उसमें ज़रा भी सुख नहीं, यहाँतक कि जानकी भी ख़ैर नहीं है। एक तरफ तो हमारी इच्छाओं और हमारे मनोरथोंकी सीमा नहीं है; दूसरी ओर हम परमपदके अभिलाषी हैं; इस लिये यहाँ भी मेल नहीं खाता। बुढ़ापा हमारे शरीरको निर्वल और रूपको कुरूप करता एवं सामर्थ्य और बलका नाश करता है तथा मृत्यु खिरपर मँडराती है। ऐसी दशामें मित्रवर ! कहीं सुख नहीं है। अगर सुख—सच्चा सुख चाहते हो, तो परमात्मा का भजन करो। उससे आपके इहलोक और परलोक दोनों सुधरेंगे, आप जन्म-मरणके कष्टसे छुटकारा पाकर मोक्ष-पद पायेंगे। सारांश यह है, कि सच्चा और नित्य सुख केवल वैराग्य और इश्वर-भक्तिमें है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं।

“तुलसी” मिटै न कल्पना, गये कल्पतरु-छाँह ।

जब लगि द्वै न करि कृपा, जनक-सुता को नाह ॥

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