भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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काम, कारणवश, बहुत ही जल्दीमें—कोई दो सप्ताहमें ही—शेष किया है।

यह कहने की जरूरत नहीं, कि महाराज भर्तृहरि के प्रत्येक शतक ( नीति, श्रद्धा और वैराग्य ) का प्रत्येक श्लोक 'लाख-लाख रूप्यों के लिए भी सस्ता है। आपके पदोंका मनुष्यके दिल पर जैसी जल्दी असर होता है, औरों के पदोंका वैसा नहीं होता। पढ़ने और समझनेवालेको जो मज़ा आता है, वह कह कर और लिखकर बताया नहीं जा सकता। उस मज़ेको दिल ही जानता है। दुःख है, कि दिलके ज़बान नहीं और ज़बान के दिल नहीं। प्रत्येक पढ़े-लिखे सज्जन इस "वैराग्य शतक" को रोज-रोज़ या हफ़्तेमें एक बार अवश्य देखा करें, ताकि इस मिथ्या जगत् की असारताको समझे, विषय-वास-नाओंको त्यागे, परोपकार में मन लगावे और अपनी आगेकी लम्बी सफ़रका सामान करें' अथवा परमात्माकी निष्काम भक्ति करते हुए परमपद या मोक्ष-प्राप्तिकी चेष्टा करें।

"वैराग्यशतक" के बहुतसे हिन्दी अनुवाद मौजूद हैं ; पर उनके अनुवादकोंने यथेष्ट कष्ट नहीं उठाया ; इसलिये प्रत्येक थोड़ा पढ़ा-लिखा इस रुझे वेदान्त-विषयको दिल चलाकर भी समझ नहीं सकता। थोड़े-पढ़े लिखे सज्जन भी इस मोक्षकी राह दिखाने वाले विषयको समझे और लाभ उठावे, इसी गुरुसे यह अनुवाद किया गया है। इसीसे इसकी भाषा भी, जहाँ तक हो सका है, खूब ही सरल रखी गई है। शब्दार्थ