भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २२० )

एक वैश्य और उसके पुत्र ।

एक वैश्यने लाखों-करोड़ों रुपये कमाये और अपने धनमेंसे चार-चार लाख रुपये अपने पुत्रोंको देकर, उनकी अलग-अलग दूकानें करवा दीं । शेष धन उसने दीवारोंमें चुनवा दिया । बन्द रोज़के बाद वह स्वस्त बीमार हो गया । उसे सन्निपात हो गया और वह आन-तान बकने लगा । लोगोंने उसका अन्त समय समझ उससे कहा—“सेठजी ! बहुत धन कमाया है, इस वक्त कुछ पुण्य कीजिये, क्योंकि इस समय धर्म ही साथ जायगा ; ली-पुत्र धन प्रभृति साथ न जायँगे ।” वैश्यका गला बन्द हो गया था, अतः वह बोल न सकता था । उसने बारम्बार दीवारोंकी तरफ हाथ किये । इशारोंसे बताया कि, इन दीवारोंमें धन गड़ा है, उसे निकालकर पुण्य कर दो । पुत्र पिताका मतलब समझकर बोले—“पिताजी कहते हैं, जो धन था, सो तो, इन दीवारोंमें लगा दिया, अब और धन कहाँ है ?” लोगोंने लड़कोंकी बात मान ली । वैश्य अपने पुत्रोंकी बेई-मानी देखकर बहुत रोया, पर बोल न सकता था, इसलिये छटपटा-छटपटा कर मर गया । लड़कों ने उसे श्मशान पर ले जाकर जला दिया । वैश्यके मन की मन ही मैं रह गई । इससे बढ़कर पुत्रों की शत्रुता क्या होगी ?

जो लोग सैकड़ों प्रकार के अनर्थ और बेईमानी से पराया