भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पृष्ठ 316

( २१६ )

“आत्मपुराण”में कहा है :—

दरिद्रं पुरुषं दृष्ट्वा नार्यः कामातुरा अपि ।

स्यण्डुं नेच्छन्ति कुणपं यद्वक्क्रमिद्विषितम् ॥

स्वियाँ कामसे आतुर होने पर भी, दरिद्री पतिको छूना पसन्द नहीं करती; जिस तरह कीडोंसे दूषित मुर्दोंको कोई छूना नहीं चाहता ।

स्पष्ट हो गया कि, स्त्री ऊपरसे ही सुन्दर है; भीतरसे वह महागन्दी और पाषाणवत् कठोरहृदय है; जिस समय इसमें निर्दयता आती है, उस समय यह अपने कीतदासकी तरह सेवा करनेवाले पति और अपने उदरसे निकले हुए पुत्रके ऊपर भी दया नहीं करती । अपने स्वार्थके लिये यह उनकी भी हत्या कर डालती और नरककी राह दिखाती है; अतः स्त्रीके मोहमें फँसना, अपने नाशका सामान करना है । जिस तरह पतंग दीपकके रूप पर मोहित होकर अपना नाश करता है; उसी तरह कामी भी स्त्रीके रूप पर मुग्ध होकर अपने लोक-परलोक गँवाता है—इस जन्ममें धोर विन्ताश्रमिमें जलता और मरने पर नरकाश्रमिमें भस्म होता और तड़पता है ।

वास्तवमें स्त्रीपुत्र आदि शत्रु हैं, पर पुरुष अज्ञानतासे इन्हें अपना मित्र समझता है । महात्मा शंकराचार्यने अपनी प्रशोत्तरमालामें लिखा है—“स्त्री पुत्र देखनेमें मित्र मालूम होते हैं, पर असलमें वे शत्रु हैं ।”