वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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अनेक प्रकारसे सेवा-टहल करने पर भी यदि पुरुषसे कोई प्ररमायश पूरी नहीं होती, तो वह बाधिनकी तरह घुराती है। देवात्, यदि पुरुष निर्धन हो जाता है या उसके सिर पर ऋणभार हो जाता है, तो वही सात फेरोंकी व्याही खी उसका अनादर और उसकी मरण-कामना करती है ; क्योंकि इस जगत्में धन ही की कीमत है, मनुष्यकी कीमत नहीं। कहते हैं, निर्धन पुरुषको वेश्या तज देती है। वेश्याका तो नाम प्रसिद्ध है ही ; पर वेद-विधिसे व्याही हुई खी भी अपने पतिको तज देती है। धन-हीनको माता, पिता, भाई, बहिन, भौजाई, तौकर-चाकर एवं अन्य श्वितेदार सभी बुरी नज़रसे देखते और उसे त्याग देते हैं। संसार अर्थ—धनके वशमें है। जिसके पास धन नहीं, उसका कोई नहीं। कहा है—
माता निन्दति नाभिनन्दति पिता भ्राता न सम्भाषते भृत्यः कुप्यति नासुगच्छति सुतः कान्ता च नालगते । अर्थप्रार्थनशक्या न कुरुतेऽप्यालापमात्रं सुहृत् तस्मादर्थमुपाजयस्व च सखे ! ह्यर्थस्यसर्वेश्वराः ॥
माता निर्धन पुत्रकी निन्दा करती है, बाप आदर नहीं करता, भाई बात नहीं करता, चाकर क्रोध करता है, पुत्र आशा नहीं मानता, खी आलिङ्गन नहीं करती और धन माँगनेके डरसे मित्र कोरी बात भी नहीं करता ; इसलिये मित्र धन कमाओ, क्योंकि सभी धनके वशमें हैं।