वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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इच्छा करता और शिकारियों के जालमें फँसकर, बन्धनमें बँध, नाना प्रकारके दुःख भलेता है ; उसी तरह जो पुरुष स्त्रीको इच्छा करता है, वह बन्धनमें बँधता और नाश होता है। स्त्री संसारवृक्षका बीज है, अतः स्त्री-कामी पुरुषका इस संसारसे पीड़ा नहीं छूटता। वह इस दुनियामें आकर, स्त्रीके कारण, नाना प्रकारके दुःख भोगता, चिन्ताश्रमिने दिनरात जलता और अन्तमें मरकर ममता और वासनाके कारण फिर जन्म लेता और दुःख भोगता है।
स्त्री कामीपुरुषको जरासे लालचसे अपना दास बना लेती है। कामी पुरुष स्त्रीके इशारे पर उसी तरह नाचता है, जिस तरह बन्दर मदारीके इशारे पर नाचता है। वह रात-दिन उसके खुश करनेकी कोशिशोंमें लगा रहता है, घर-बाहर सोते-जागते उसीकी चिन्ता रखता है, उसीके लिये धन-गर्विवंत धनियोंकी स्तुशामर्द करता, उनकी टेढ़ी-सूँधी सुनता और आत्मप्रतिष्ठा खोता है। इतने पर भी स्त्रीकी फ़रमायशों पूरी नहीं होतीं। आज वह गहना माँगती है, तो कल कपड़े माँगती है और परसों पुत्र या कन्याके विवाहकी बात कहती है। कभी कहती है आज आटा नहो है, कभी कहती है आज घरमें तेल-नोन नहीं है, इसी तरह उसकी फ़रमायशोंका अन्त नहीं आता, पर बेचारे पुरुषका अन्त आ जाता है। स्त्रीकी सेवा-चाकरीसे उसे इतनी भी फ़ुरसत नहीं मिलती कि, वह क्षण-भर भी अपने बनानेवाले स्वामीको पदचन्दन कर सके।