भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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काम करता है। वजह यह है कि, मोहान्म्य अज्ञानी पुरुषको अच्छे-बुरेका ज्ञान नहीं।

जो नारी नरक-कूपके समान गन्दगीसे भरी है, जो सब तरहसे अपवित्र और घृणायोग्य है, जिसमें प्रीतिका नामो-निशान भी नहीं है, जो केवल अपने स्वार्थसे पुरुषको प्यार करती है, पतिके निर्धन या कर्जदार होते ही उससे प्रीति कम कर देती या उसे त्याग देती है, जो क्षण-भरमें परायी हो जाती है, उसी नारीको पुरुष अपनी प्राणचक्षुभा कहता और उसके लिये अपनी सारी सुख-शान्तिको तिलाञ्जलि देकर मरने तकको तैयार हो जाता है। क्या यह अज्ञानता नहीं है ?

कवियोंने मोहवश स्त्रीके अंगोंकी बड़ी लम्बी-चौड़ी तारीफ की है। उसके दोनों स्तनोंको किसीने अनारों, किसीने शन्तरों अथवा दो सोनेके कलशोंकी उपमा दी है ; पर वास्तवमें वे मांसके लौदे हैं। उसकी जाँघोंकी केलेके बँभोंसे उपमा दी है, पर वे महागन्दी हैं ; उन पर हर समय मूत्र या सफेदा बहता रहता है। उसकी आँखोंकी उपमा हिरनीके बच्चेकी आँखोंसे दी है, पर वे सर्पसे भी भयानक हैं ; क्योंकि सर्पके काटनेसे मनुष्य बेहोश होता और मरता है, पर स्त्रीके तो देखनेमात्रसे ही वह पागलसा होकर मर मिटता है। वास्तवमें स्त्री सर्पसे भी बुरी है। सर्पका काटा एक बार ही मर जाता है, पर स्त्रीका काटा बारम्बार मरता और जन्म लेता है। जिस तरह कदली वनका हाथी कागज़की हथनोको देख, उसकी