वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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narrow-minded wealthy men who have no control over their tongue on account of their diseased and ignorant minds, is not heard.
मोह मार्जयतामुपार्जय रतिं चन्द्रार्धचूडामणौ
चेतः स्वर्णतरंगिणीतटशुवामासंगमंगीकुहुर ।
को वा वीचिषु वृद्धुदेषु च तडिलेखासु च स्त्रीषु च
ज्वालायेषु च पन्नगेषु च सरिद्रेगेषु च प्रत्ययः ॥६०॥
ऐ चित्त ! अब तू मोह छोड़ कर शिर पर अर्द्धचन्द्र धारण करने वाले भगवान् शिव से प्रीति कर और गंगा-किनारेके ब्रह्मोंके नीचे विश्राम ले । देख ! पानी की लहर, पानी के बबूले, विजली की चमक, आगकी लो, स्त्री, सर्प और नदीके-प्रवाह की स्थिरता का कोई विश्वास नहीं ; क्योंकि ये सातों चञ्चल हैं ॥६०॥
संसारका मोह त्यागो ।
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मनुष्यो ! आप लोग मोह-निद्रामें पड़े हुए क्यों अपनी दुर्लभ मनुष्य-देह को वृथा गँवा रहे हैं ? आप को यह देह इसलिये बहीं मिली है कि, आप इस भूठे संसारसे मोह कर, स्त्री-पुत्र और धन-दौलतमें भूले रहे ; बल्कि इसलिये मिली है कि, आप इस देहसे दुर्लभ मोक्ष-पदकी प्राप्ति करें । पर संसार की गति ही ऐसी है कि, वह अच्छे कामोंको त्याग कर बुरे