भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २१४ )

अभिमान त्यागकर घेसी बात कहनी चाहिये, जिससे औरोंके दिल ठण्डे हों और अपने दिलमें भी ठण्डक हो ।

तुलसीदासजी ने कहा है :—

ज्ञान गरीबी गुण धर्म, नरम बचन निर्मेष ।

तुलसी कबड़ँ न डँडिये, शील सत्य सन्तोष ॥

नित्य-अनित्यके विचारका ज्ञान, यौवन और धनादिके व्रमण्डका त्याग, सतो गुण, प्रभुमें निश्छल प्रीतिका धर्म, मीठे और नर्म बचन, निराभिमानता, शील, सत्य और सन्तोष इनको कभी न छोड़ना चाहिये । अज्ञानता, व्रमण्ड, रजोगुण-तमोगुण, अधर्म, कड़वे बचन, मान, कुशीलता, झूठ और असन्तोष—इन को छोड़ देना चाहिये ।

दोहा ।

बकल वसन फल असन कर, करिहौं वन विश्राम ।

जित अविवेकी नरनको, सुनियत नाहीं नाम ॥५६॥

59. O thou my dear Reason, be now contented with the wholesome roots and fruits of the forest for food, with the bare earth for a bed and with the bark of trees for clothing. Rise and let us go to the forest where even the names of foolish and

बकल वसन= वृक्षको छालोंके कपड़े पहनकर । फल असन कर= वृक्षोंके फल खाकर । करिहौं बनविश्राम= वनमें आराम करूँगा । जित..... नाम= जहाँ अविचारवान् वसण्डी लोगोंका नाम भी छलाई नहीं पड़ता ।