वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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चाहिये, सबसे मोटा बोलना चाहिये और सभीके साथ शिष्टाचार दिखाना और नम्रताका बर्ताव करना चाहिये। जब तक देहमें प्राण रहें, जब तक जिन्दगी रहे, यश कमाना चाहिये; बदनामीसे बचना चाहिये। अपनी जुबानसे किसी को कड़वी और बुरी लगनेवाली बात न कहनी चाहिये। जुबान का ज़ख्म तीरके ज़ख्मसे भी भारी होता है। तीरका ज़ख्म मिट जाता है, पर जुबानका ज़ख्म नहीं मिटता। इस जगत्में जो जैसा करता है, वह वैसा ही पाता है। जो जौ बोता है वह जौ काटता है; और जो गेहूँ बोता है, वह गेहूँ काटता है; जो दूसरोंका दिल दुखाता है, उसका दिल भी दुखाया जायगा; जो जैसी कहेगा, वह वैसी सुनेगा। उस्ताद् ज़ौकने कहा है—
बद न बोले ज़ेर गर्दूँ, गर कोई मेरी सुने।
हे यह गुम्बद की सदा, जैसी कहे वैसी सुने ॥
आस्मान के नीचे किसीको बुरी बात जुबानसे न निकालनी चाहिये। यह तो मठके अन्दर की आवाज़ है, जैसी कहोगे उसको प्रतिध्वनि-रूपमें वैसी ही सुनोगे। और भी एक कविने कहा है—
ऐसी बानी बोलिये, *मन का आपा खोय।
और न को शीतल करे, आपो शीतल होय ॥