भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( २१३ )

चाहिये, सबसे मोटा बोलना चाहिये और सभीके साथ शिष्टाचार दिखाना और नम्रताका बर्ताव करना चाहिये। जब तक देहमें प्राण रहें, जब तक जिन्दगी रहे, यश कमाना चाहिये; बदनामीसे बचना चाहिये। अपनी जुबानसे किसी को कड़वी और बुरी लगनेवाली बात न कहनी चाहिये। जुबान का ज़ख्म तीरके ज़ख्मसे भी भारी होता है। तीरका ज़ख्म मिट जाता है, पर जुबानका ज़ख्म नहीं मिटता। इस जगत्में जो जैसा करता है, वह वैसा ही पाता है। जो जौ बोता है वह जौ काटता है; और जो गेहूँ बोता है, वह गेहूँ काटता है; जो दूसरोंका दिल दुखाता है, उसका दिल भी दुखाया जायगा; जो जैसी कहेगा, वह वैसी सुनेगा। उस्ताद् ज़ौकने कहा है—

बद न बोले ज़ेर गर्दूँ, गर कोई मेरी सुने।

हे यह गुम्बद की सदा, जैसी कहे वैसी सुने ॥

आस्मान के नीचे किसीको बुरी बात जुबानसे न निकालनी चाहिये। यह तो मठके अन्दर की आवाज़ है, जैसी कहोगे उसको प्रतिध्वनि-रूपमें वैसी ही सुनोगे। और भी एक कविने कहा है—

ऐसी बानी बोलिये, *मन का आपा खोय।

और न को शीतल करे, आपो शीतल होय ॥

( २१४ )

अभिमान त्यागकर घेसी बात कहनी चाहिये, जिससे औरोंके दिल ठण्डे हों और अपने दिलमें भी ठण्डक हो ।

तुलसीदासजी ने कहा है :—

ज्ञान गरीबी गुण धर्म, नरम बचन निर्मेष ।

तुलसी कबड़ँ न डँडिये, शील सत्य सन्तोष ॥

नित्य-अनित्यके विचारका ज्ञान, यौवन और धनादिके व्रमण्डका त्याग, सतो गुण, प्रभुमें निश्छल प्रीतिका धर्म, मीठे और नर्म बचन, निराभिमानता, शील, सत्य और सन्तोष इनको कभी न छोड़ना चाहिये । अज्ञानता, व्रमण्ड, रजोगुण-तमोगुण, अधर्म, कड़वे बचन, मान, कुशीलता, झूठ और असन्तोष—इन को छोड़ देना चाहिये ।

दोहा ।

बकल वसन फल असन कर, करिहौं वन विश्राम ।

जित अविवेकी नरनको, सुनियत नाहीं नाम ॥५६॥

59. O thou my dear Reason, be now contented with the wholesome roots and fruits of the forest for food, with the bare earth for a bed and with the bark of trees for clothing. Rise and let us go to the forest where even the names of foolish and

बकल वसन= वृक्षको छालोंके कपड़े पहनकर । फल असन कर= वृक्षोंके फल खाकर । करिहौं बनविश्राम= वनमें आराम करूँगा । जित..... नाम= जहाँ अविचारवान् वसण्डी लोगोंका नाम भी छलाई नहीं पड़ता ।

( ३१५ )

narrow-minded wealthy men who have no control over their tongue on account of their diseased and ignorant minds, is not heard.

मोह मार्जयतामुपार्जय रतिं चन्द्रार्धचूडामणौ

चेतः स्वर्णतरंगिणीतटशुवामासंगमंगीकुहुर ।

को वा वीचिषु वृद्धुदेषु च तडिलेखासु च स्त्रीषु च

ज्वालायेषु च पन्नगेषु च सरिद्रेगेषु च प्रत्ययः ॥६०॥

ऐ चित्त ! अब तू मोह छोड़ कर शिर पर अर्द्धचन्द्र धारण करने वाले भगवान् शिव से प्रीति कर और गंगा-किनारेके ब्रह्मोंके नीचे विश्राम ले । देख ! पानी की लहर, पानी के बबूले, विजली की चमक, आगकी लो, स्त्री, सर्प और नदीके-प्रवाह की स्थिरता का कोई विश्वास नहीं ; क्योंकि ये सातों चञ्चल हैं ॥६०॥

संसारका मोह त्यागो ।

— ✧ —

मनुष्यो ! आप लोग मोह-निद्रामें पड़े हुए क्यों अपनी दुर्लभ मनुष्य-देह को वृथा गँवा रहे हैं ? आप को यह देह इसलिये बहीं मिली है कि, आप इस भूठे संसारसे मोह कर, स्त्री-पुत्र और धन-दौलतमें भूले रहे ; बल्कि इसलिये मिली है कि, आप इस देहसे दुर्लभ मोक्ष-पदकी प्राप्ति करें । पर संसार की गति ही ऐसी है कि, वह अच्छे कामोंको त्याग कर बुरे

( २१६ )

काम करता है। वजह यह है कि, मोहान्म्य अज्ञानी पुरुषको अच्छे-बुरेका ज्ञान नहीं।

जो नारी नरक-कूपके समान गन्दगीसे भरी है, जो सब तरहसे अपवित्र और घृणायोग्य है, जिसमें प्रीतिका नामो-निशान भी नहीं है, जो केवल अपने स्वार्थसे पुरुषको प्यार करती है, पतिके निर्धन या कर्जदार होते ही उससे प्रीति कम कर देती या उसे त्याग देती है, जो क्षण-भरमें परायी हो जाती है, उसी नारीको पुरुष अपनी प्राणचक्षुभा कहता और उसके लिये अपनी सारी सुख-शान्तिको तिलाञ्जलि देकर मरने तकको तैयार हो जाता है। क्या यह अज्ञानता नहीं है ?

कवियोंने मोहवश स्त्रीके अंगोंकी बड़ी लम्बी-चौड़ी तारीफ की है। उसके दोनों स्तनोंको किसीने अनारों, किसीने शन्तरों अथवा दो सोनेके कलशोंकी उपमा दी है ; पर वास्तवमें वे मांसके लौदे हैं। उसकी जाँघोंकी केलेके बँभोंसे उपमा दी है, पर वे महागन्दी हैं ; उन पर हर समय मूत्र या सफेदा बहता रहता है। उसकी आँखोंकी उपमा हिरनीके बच्चेकी आँखोंसे दी है, पर वे सर्पसे भी भयानक हैं ; क्योंकि सर्पके काटनेसे मनुष्य बेहोश होता और मरता है, पर स्त्रीके तो देखनेमात्रसे ही वह पागलसा होकर मर मिटता है। वास्तवमें स्त्री सर्पसे भी बुरी है। सर्पका काटा एक बार ही मर जाता है, पर स्त्रीका काटा बारम्बार मरता और जन्म लेता है। जिस तरह कदली वनका हाथी कागज़की हथनोको देख, उसकी

( २१७ )

इच्छा करता और शिकारियों के जालमें फँसकर, बन्धनमें बँध, नाना प्रकारके दुःख भलेता है ; उसी तरह जो पुरुष स्त्रीको इच्छा करता है, वह बन्धनमें बँधता और नाश होता है। स्त्री संसारवृक्षका बीज है, अतः स्त्री-कामी पुरुषका इस संसारसे पीड़ा नहीं छूटता। वह इस दुनियामें आकर, स्त्रीके कारण, नाना प्रकारके दुःख भोगता, चिन्ताश्रमिने दिनरात जलता और अन्तमें मरकर ममता और वासनाके कारण फिर जन्म लेता और दुःख भोगता है।

स्त्री कामीपुरुषको जरासे लालचसे अपना दास बना लेती है। कामी पुरुष स्त्रीके इशारे पर उसी तरह नाचता है, जिस तरह बन्दर मदारीके इशारे पर नाचता है। वह रात-दिन उसके खुश करनेकी कोशिशोंमें लगा रहता है, घर-बाहर सोते-जागते उसीकी चिन्ता रखता है, उसीके लिये धन-गर्विवंत धनियोंकी स्तुशामर्द करता, उनकी टेढ़ी-सूँधी सुनता और आत्मप्रतिष्ठा खोता है। इतने पर भी स्त्रीकी फ़रमायशों पूरी नहीं होतीं। आज वह गहना माँगती है, तो कल कपड़े माँगती है और परसों पुत्र या कन्याके विवाहकी बात कहती है। कभी कहती है आज आटा नहो है, कभी कहती है आज घरमें तेल-नोन नहीं है, इसी तरह उसकी फ़रमायशोंका अन्त नहीं आता, पर बेचारे पुरुषका अन्त आ जाता है। स्त्रीकी सेवा-चाकरीसे उसे इतनी भी फ़ुरसत नहीं मिलती कि, वह क्षण-भर भी अपने बनानेवाले स्वामीको पदचन्दन कर सके।

( २१८ )

अनेक प्रकारसे सेवा-टहल करने पर भी यदि पुरुषसे कोई प्ररमायश पूरी नहीं होती, तो वह बाधिनकी तरह घुराती है। देवात्, यदि पुरुष निर्धन हो जाता है या उसके सिर पर ऋणभार हो जाता है, तो वही सात फेरोंकी व्याही खी उसका अनादर और उसकी मरण-कामना करती है ; क्योंकि इस जगत्में धन ही की कीमत है, मनुष्यकी कीमत नहीं। कहते हैं, निर्धन पुरुषको वेश्या तज देती है। वेश्याका तो नाम प्रसिद्ध है ही ; पर वेद-विधिसे व्याही हुई खी भी अपने पतिको तज देती है। धन-हीनको माता, पिता, भाई, बहिन, भौजाई, तौकर-चाकर एवं अन्य श्वितेदार सभी बुरी नज़रसे देखते और उसे त्याग देते हैं। संसार अर्थ—धनके वशमें है। जिसके पास धन नहीं, उसका कोई नहीं। कहा है—

माता निन्दति नाभिनन्दति पिता भ्राता न सम्भाषते भृत्यः कुप्यति नासुगच्छति सुतः कान्ता च नालगते । अर्थप्रार्थनशक्या न कुरुतेऽप्यालापमात्रं सुहृत् तस्मादर्थमुपाजयस्व च सखे ! ह्यर्थस्यसर्वेश्वराः ॥

माता निर्धन पुत्रकी निन्दा करती है, बाप आदर नहीं करता, भाई बात नहीं करता, चाकर क्रोध करता है, पुत्र आशा नहीं मानता, खी आलिङ्गन नहीं करती और धन माँगनेके डरसे मित्र कोरी बात भी नहीं करता ; इसलिये मित्र धन कमाओ, क्योंकि सभी धनके वशमें हैं।

( २१६ )

“आत्मपुराण”में कहा है :—

दरिद्रं पुरुषं दृष्ट्वा नार्यः कामातुरा अपि ।

स्यण्डुं नेच्छन्ति कुणपं यद्वक्क्रमिद्विषितम् ॥

स्वियाँ कामसे आतुर होने पर भी, दरिद्री पतिको छूना पसन्द नहीं करती; जिस तरह कीडोंसे दूषित मुर्दोंको कोई छूना नहीं चाहता ।

स्पष्ट हो गया कि, स्त्री ऊपरसे ही सुन्दर है; भीतरसे वह महागन्दी और पाषाणवत् कठोरहृदय है; जिस समय इसमें निर्दयता आती है, उस समय यह अपने कीतदासकी तरह सेवा करनेवाले पति और अपने उदरसे निकले हुए पुत्रके ऊपर भी दया नहीं करती । अपने स्वार्थके लिये यह उनकी भी हत्या कर डालती और नरककी राह दिखाती है; अतः स्त्रीके मोहमें फँसना, अपने नाशका सामान करना है । जिस तरह पतंग दीपकके रूप पर मोहित होकर अपना नाश करता है; उसी तरह कामी भी स्त्रीके रूप पर मुग्ध होकर अपने लोक-परलोक गँवाता है—इस जन्ममें धोर विन्ताश्रमिमें जलता और मरने पर नरकाश्रमिमें भस्म होता और तड़पता है ।

वास्तवमें स्त्रीपुत्र आदि शत्रु हैं, पर पुरुष अज्ञानतासे इन्हें अपना मित्र समझता है । महात्मा शंकराचार्यने अपनी प्रशोत्तरमालामें लिखा है—“स्त्री पुत्र देखनेमें मित्र मालूम होते हैं, पर असलमें वे शत्रु हैं ।”

( २२० )

एक वैश्य और उसके पुत्र ।

एक वैश्यने लाखों-करोड़ों रुपये कमाये और अपने धनमेंसे चार-चार लाख रुपये अपने पुत्रोंको देकर, उनकी अलग-अलग दूकानें करवा दीं । शेष धन उसने दीवारोंमें चुनवा दिया । बन्द रोज़के बाद वह स्वस्त बीमार हो गया । उसे सन्निपात हो गया और वह आन-तान बकने लगा । लोगोंने उसका अन्त समय समझ उससे कहा—“सेठजी ! बहुत धन कमाया है, इस वक्त कुछ पुण्य कीजिये, क्योंकि इस समय धर्म ही साथ जायगा ; ली-पुत्र धन प्रभृति साथ न जायँगे ।” वैश्यका गला बन्द हो गया था, अतः वह बोल न सकता था । उसने बारम्बार दीवारोंकी तरफ हाथ किये । इशारोंसे बताया कि, इन दीवारोंमें धन गड़ा है, उसे निकालकर पुण्य कर दो । पुत्र पिताका मतलब समझकर बोले—“पिताजी कहते हैं, जो धन था, सो तो, इन दीवारोंमें लगा दिया, अब और धन कहाँ है ?” लोगोंने लड़कोंकी बात मान ली । वैश्य अपने पुत्रोंकी बेई-मानी देखकर बहुत रोया, पर बोल न सकता था, इसलिये छटपटा-छटपटा कर मर गया । लड़कों ने उसे श्मशान पर ले जाकर जला दिया । वैश्यके मन की मन ही मैं रह गई । इससे बढ़कर पुत्रों की शत्रुता क्या होगी ?

जो लोग सैकड़ों प्रकार के अनर्थ और बेईमानी से पराया

( २२१ )

अन हड़प कर अथवा और तरह से दुनिया का गला काट कर छावों-करोड़ों अपने पुत्र-पौत्रों को छोड़ जाते हैं, वे इस कहानी से शिक्षा ग्रहण करें और पुत्रोंका भूटा मोह त्यागें। इस जगत्में न कोई किसीका पुत्र है न पिता। माता-पिता, भाई-बहिन और स्त्री-पुत्र सभी एक लम्बी यात्रा के यात्री हैं। यह मृत्युलोक उस यात्रा के बीचका मुकाम है। इस मुकाम पर आकर सब इकट्ठे हो गये हैं। कोई किसी से सन्धी प्रीति नहीं रखता। सभी स्वार्थ की रस्सी में एक दूसरे से बँधे हुए हैं। जब जिसके चलने का समय आजाता है, तब वही निर्माही की तरह सबको छोड़कर चल देता है। जो लोग उस चले जाने-वाले या मर जाने वालेके लिए प्राण न्यौछावर करते थे, उसके लिए मरने तक को तैयार रहते थे, उनमें से कोई उसके साथ पौली तक जाता है और कोई उसे श्मशान-भूमि तक पहुँचा कर और जला-बलाकर खाक कर आता है। ऐसे नातेदारोंसे अनुराग करना—उनमें ममता रखना बड़ी ही गलती है। कहा है:—

“परलोक की राहमें जीव अकेला जाता है; केवल धर्म उसके साथ जाता है। धन, धरती, पशु और स्त्री घरमें ही रह जाते हैं। लोग श्मशान तक जाते हैं और देह चिता तक साथ रहती है।”

बहुत लोग यह समझते हैं—कि, पुत्र-बिना गति नहीं होती; पुत्र-हीन पुरुष नरक में जाता है और पुत्रवान् स्वर्ग में जाता

( २२२ )

है। जो लोग ऐसा समझते हैं; वह बड़ी भूल करते हैं। पुत्रों से किसी की भी गति न तो हुई है और न होगी; सब की गति अपने ही पुरुषार्थ से होती है। अगर पुत्रों से स्वर्ग या मोक्षकी प्राप्ति होती, तो कोई विरला ही नरकमें जाता। जो जैसा करता है, उसे वैसा ही फल भोगना होता है। ब्रह्महत्या, स्त्रीहत्या, भ्रूणहत्या, परस्त्रीगमन और परधन-हरण प्रभृति पापोंका फल कर्ताको भोगना ही होता है। जो ऐसा समझते हैं कि, ऐसे पाप करने पर भी पुत्र-पौत्रोंके होनेसे, हम दण्ड से बच जायेंगे, वे बड़े ही मूर्ख हैं। ज्ञानी लोग तो संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये अपने पुत्रों का भी त्याग कर देते हैं।

एक ब्राह्मण और उसका अन्धा पुत्र।

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किसी नगर में एक ब्राह्मण रहता था। उसके पुत्र नहीं हुआ था, इसलिये उसने गंगाजीकी उपासना की। अन्त में, बूढ़ी अवस्था में, उसके एक अन्धा पुत्र हुआ। ब्राह्मण उस अन्धे पुत्र को पाकर ही बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने खूब उत्सव और भोज प्रभृति किये। इसके बाद जब वह अन्धा पुत्र पाँच बरस का हुआ, ब्राह्मणने उसका यज्ञोपवीत-संस्कार कराकर, उसे विद्या पढ़ाना आरम्भ किया। चन्द्रोज में वह अन्धा पूर्ण पण्डित हो गया।

एक दिन पिता-पुत्र बैठे थे। पुत्र ने पिता से पूछा—

( २२३ )

“पिताजी ! मनुष्य अन्ध्या किस पाप से होता है ?” पिताने उत्तर दिया—“पुत्र ! जो पूर्व जन्ममें रत्नोंकी चोरी करता है, वह अन्ध्या होता है ।” पुत्रने कहा—“पिताजी ! यह बात नहीं है । कारण के गुण कार्यमें भी आ जात हैं । आप अन्धे हैं, इसीसे मैं भी अन्ध्या हुआ हूँ ।” पिताने क्रोधमें भरकर कहा “नालायक, मैं अन्ध्या कैसे ?” पुत्रने कहा—“पिताजी ! गंगा-माता साक्षात् मुक्ति देनेवाली हैं । आपने उनकी उपासना पुत्रकी कामना से की ; इसी से मैं आपको अन्ध्या संसकता हूँ । जो वेद-शास्त्र पढ़ कर भी पेशाव के कीड़े की इच्छा करता है, वह अन्ध्या नहीं तो क्या सूक्ष्मता है ? पेशाव से जैसे और अनेक प्रकार के कीड़े पैदा होते हैं, वैसे ही पुत्र भी उसका एक कीड़ा ही है । आपने जिस पुत्र के लिये गंगाजी की इतनी तपस्या की, वह पुत्र तो कुत्ते-बिल्ली और सूअर प्रभृति पशुओं के अनायास ही हो जाते हैं । पुत्र-जैसे मूत्र के कीड़े से किसी को भी स्वर्ग या मोक्ष लाभ नहीं हो सकता ; पिताजी ! न कोई किसीका पुत्र है न स्त्री प्रभृति ; सब एक ही हैं, क्योंकि सबमें एक ही आत्मा है । वही आत्मा पितामें है, वही पुत्र और स्त्रीमें । जिस तरह मरुभूमिमें भ्रमसे जल दीखता है, पर वास्तवमें वहाँ जलका नाम-निशान भी नहीं ; उसी तरह भ्रमसे यह जगत् सच्चा दीखता है, पर वास्तवमें कुछ भी नहीं । यह मेरा पुत्र है, यह मेरी स्त्री है, यह मेरा धन है, यह मेरा मकान है—ऐसा वासनासे दीखता है । वासना

( २२४ )

से ही जीव संसार-बन्धनमें बँधता है ; यानी वासनासे ही शरीर धारण करता है। वासनासे ही मनुष्य अज्ञानी बन रहा है। वासनाका त्याग करते ही मनुष्य, ज्ञान-लाभ करके, परमानन्द की प्राप्ति करता है। ज्ञानी सच्चिदानन्द रूप ब्रह्मको ज्ञान की आँखोंसे देखता है, पर अज्ञानी उसे नहीं देख सकता। जैसे अन्येको सूर्य नहीं दीखता, उसी तरह अज्ञानीको ब्रह्म नहीं दीखता ; इसीसे अज्ञानीको, बाहरकी आँखें होनेपर भी अन्या कहते हैं। आप भेद-बुद्धिको त्याग कर, सबमें एक आत्माको देखो। आत्मज्ञानी होनेसे ही आपको नित्य सुख मिलेगा।”

पिता-पुत्रके अगाध पाण्डित्य और ज्ञानको देख एकदम चकित हो गया और कहने लगा—“पुत्र ! मैंने चार वेद, छहों शास्त्र, उपनिषद्, स्मृति और पुराण प्रभृति पढ़कर कुछ भी ज्ञान लाभ न किया ; तेरी बातोंसे मेरी आँखें खुल गईं।”

संसारको मिथ्या समझकर ही कोई ज्ञानी कहता है :—

“हे मन ! तू स्त्रीके प्रेममें मत भूल ; यह बिजलीकी चमक, नदीके प्रवाह और नदीकी तरङ्ग प्रभृतिकी तरह चञ्चल है। स्त्रीके प्रेमको कोई ठिकाना नहीं ; आज यह तेरी है, कल पराई है। एक करवट बदलनेमें स्त्री पराई हो जाती है। इसकी कूछी प्रीतिमें कोई लाभ नहीं। गोरुबामी तुलसीदासजी कहते हैं :—

( २२५ )

उरग तुरग नारी रूपाति, नर नीचो हथियार । तुलसी परखत रहब नित, इनाहँ न पलटत बार ॥

सर्प, घोड़ा, खी, राजा, नाच पुरुष और हथियार—इनको सदा परखते रहना चाहिये, इनसे कभी ग्राफ़िल न रहना चाहिये, क्योंकि इन्हें पलटते देर नहीं लगती ।

हे मन ! यदि तुझे प्रीति ही करनी है, तो उठ, गङ्गा-किनारेके चूड़ों के नीचे : चल बैठ और आशुतोष भगवान् चन्द्रशेखर— शिवजीसे प्रीति कर । उनको प्रीति सच्ची और कल्याणकारी है ।

गोस्वामीजीने और भी कहा है:—

कै ममता कर रामपद, कै ममता कर हेल । “तुलसी” दो मैंहँ एक अब, खेल छाँड़ि छल खेल ॥ सम्मुख हवै रघुनाथके, देह सकल जग पीठि । तजै कैजुरी उरग कहँ, हेत अधिक अति दीठि ॥

या तो भगवान्के चरणोंमें ममता कर अथवा देहके सब नातोंको त्यागकर उदासीन हो जा और कर्म ज्ञानादि साधन करके मनको शुद्ध कर ले । जब तेरा मन शुद्ध हो जायगा, तब भगवान्के चरणोंमें आप ही स्नेह हो जायगा । इन दोनों बातोंमें से जो एक बात तुझे पसन्द हो, उसे छल छोड़कर दिलसे कर ; एक खेल-खेल । सारांश यह, कि भगवान्में सहज स्नेह कर । अगर तेरा मन प्रभुकी भक्तिमें नहीं जमता, तो खी-पुत्र आदि संसारी भोगोंसे मन हटाकर, प्रभुकी भक्तिकी चैष्टा कर ।

१५

(( २२६ ))

जब भगवानमें तेरा मन लग जाय, तब संसारकी तरफ-से मुँह फेर ले—संसारको पीठ दे-दे, जिससे तेरे मनमें लोक-वासना न आने पावे ; क्योंकि वासनासे हृदयकी दृष्टि मेली हो जाती है। साँपका भोतरी चमड़ा जब मोटा हो जाता है, तब उसे आँखोंसे साफ नहीं दीखता ; लेकिन जब वह काँचली छोड़ देता है, तब उसकी आँखोंका पटल उतर जाता है ; आँखोंके साफ हो जानेसे साँपको खूब साफ दीखने लगता है। जिस तरह काँचली त्यागनेसे सर्पकी दृष्टि साफ हो जाती है ; उसी तरह वासना त्याग देनेसे ईश्वरके भक्तोंकी हृदय-दृष्टि साफ रहती और उन्हें भगवानके दर्शन होते रहते हैं।

छप्पय ।

मोह छाँड़ मन-मीत ! शीति सों चन्द्रचूड़ भज ! सुर-सरिताके तीर, धीरे घर दृढ़ आसन सज !! शम दम भोग-विराग, त्याग तपको—तू अशुसरि । वृथा विषय-बकवाद, स्वाद सबही—तू परिहरि ॥ थिर नहि तरंग, बुद्धुद, तडित, अगिन-शिखा, पन्तग, सरित । त्यौही तन जोवन धन अथिर, चल दलदल कैसे चरित ॥६०॥

मन मीत—हे मन-मित्र ! प्रीतिसे—प्रेमसे । चन्द्रचूड़—चन्द्रभोज, मन्दभौलि, चन्द्रशेखर, शिव, महादेव । भज—भजन कर । सुर-सरिता=देवताओंकी नदी, गङ्गा । आसन=योगियोंके बैठनेका प्रकार ; पद्मासन

( २२७ )

60. O my mind, do thou give up, all attachment now and cherish at heart a deep love for the Great Shiva, who bears the new moon in his forehead and take up thy sojourn on the land by the side of the heavenly river Ganges. Who ever trusts the currents of the ocean, the bubbles of water, the streaks of lightning, women, the flames of burning fires, serpents and the flow of rivers, all of which are uncertain in their conduct ?

अथे गीतं सरसकवयः पारवतो दाक्षिणात्याः

पृष्ठे लीलावलयरणितं चामर्याहिणीनाम् ॥

ययास्त्येवं कुरु भवरसास्वादने लंपटस्तवं नो

चेच्छतः प्रविश सहसा निर्विकल्पे समाधौ ॥१॥

हे मन ! तेरे सामने चतुर गँवैये गाते हों, दाहिने-बायें दक्खन देशके उत्तम कवि सरस काव्य सुनाते हों, तेरे पीछे चँवर ढोलने वाली सुन्दरी स्त्रियोंके कंकलोंकी मधुर भनकार होता है,—

स्वतिकासन आदि । शम=इन्द्रिय-निग्रह, इन्द्रिय वश करना । दम=बाहरी इन्द्रियोंका निग्रह ; तपस्याके क्लेश सहनेकी शक्ति । विराग=ममता-त्याग ; विरक्ति ; हंसारमें आसक्ति न रखना । भोग-विराग=छो आदिमें आसक्ति न रखना । त्याग=वैराग्य । अनुसरि=अनुवर्त्तन कर, पीछे चलो । कृथा विषय-बकवाद्=फिज़ूल गपथाप, व्यर्थकी बातें बताना । स्वाद=जायके । परिहरि=छोड़, त्याग । थिर=स्थिर । तरंग=लहर । बुदबुद=बुलबुल । तडित=बिजली । अगिन-शिखा=आगकी लो । पक्षग=सर्प । सरित=नदी । त्यौही=उसी तरह । तन=शरीर । जोवन=, यौवन, जवानी । अथिर=चंचल । चल=चंचल । दलदल=भसान ।

( २२८ )

यदि ऐसे सामान तुम्हे मयस्सर हों, तो तू संसार-रसात्वादनमें मग्न हो ; नहीं तो सबका ध्यान छोड़, निर्विकल्प समाधिमें लीन हो ॥६१॥

61. If thou hast in thy front the singing of the musicians, on thy sides the reciting of elegant poetry by learned southerners, behind thee the tinkling sound of the anklets of maids waving chamars, then there may not be any objection to thy giving up thyself to the enjoyment of worldly pleasures. But if, O mind, thou hast not all these things, it behoves thee at once to enter into the Nirvikalpa Samadhi (meditation of God without thinking of anything else).

विरमत बुधा योषितसंगात्सुवात्त्वगभंगुरा-

त्कुरुत कुरुणामैवीपज्ञावधूजनसंगमम् ॥

न खलु नरके हाराक्रान्तं धनस्तनमण्डलं

शरणमथवा श्रोणीविम्बं रगान्मथिमेखलम् ॥६२॥

हे बुद्धिमानो ! स्त्रियोंके संगसे बचो, क्योंकि उनके संगसे जो सुख मिलता है, वह क्षणिक है। आप मैत्री, कुरुणा और बुद्धिरूपी बधूके साथ संगम करो। जिस समय नरकमें सजा मिलेगी, उस समय युवतियोंके हारेसे शोभित स्तनद्वय और उनकी चूँवरोंदार कर्धनियों से सुशोभित कमरे तुम्हारी सहायता न करेंगी ॥६२॥

मनुष्यो, स्त्रियोंमें मन मत लगाओ। उनके साथ रहने, उनके साथ संगम करनेसे सुख होता है ; पर वह सुख नश्वर

( २२६ )

और क्षणस्थायी है। वह ऐसा सुख नहीं, जो सदा रहे। परिणाममें, उससे अनेक प्रकारके दुःख होते हैं। जो सुख अतित्य है, शेषमें दुःखोंका मूल और शोभोंकी खान है, उस सुखको सुख समझना, बुद्धिमानोंका काम नहीं। अगर आपको सद्गुण ही करना है, तो आप सद्धानुभूति, परोपकार-वृत्ति एवं प्रज्ञारूपी वह के साथ सद्गुण कीजिये। इनके साथ सद्गुण और प्रीति करने से आप को नित्य सुख मिलेगा; ऐसा सुख मिलेगा, जो इस लोक और परलोक में सदा स्थिर रहेगा।

जिन लोगों ने पहले दूसरों के दुःख दूर किये हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए जाने दी हैं, जिन्होंने ज्ञान से काम लिया है, उनका भला ही हुआ है। अगर आप स्त्री-सुख में भूले रहोगे, तो जब आपको नरक की भयङ्कर यातनायें भोगनी पड़ेगी, जब आप पर यमदूतोंके डण्डे पड़ेगे, उस समय क्या खियोंके हारों से सुशोभित स्तन-मण्डल और कर्धनियोंसे शोभायमान पतली कमरें आपकी रक्षा कर सकेंगी? नहीं, इनसे कोई लाभ न होगा; उस समय ये आड़े न आयेंगे। उस मौकेपर, परोपकार करके जो पुण्य संचय किया होगा, वही आपकी रक्षा करेगा। बुद्धिसे काम लोगे तो भला होगा; क्योंकि बुद्धि ही आपको नरकसे बचनेकी राह बतावेगी; किन्तु स्त्री तो आपको स्त्री नरककी राह दिखावेगी। आश्चर्य है, कि अज्ञानी लोग अच्छे को बुरा और बुरेको अच्छा समझते हैं। वे अपने सच्चे-

( २३० )

मित्रोंसे प्रीति नहीं करते, किन्तु भूठे और कुराहमें ले जानेवालोंसे प्रीति करते हैं। महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है:—

( १ )

विषही की भूमि माँहि, विषके अंकुर भये ॥ नारी-विषवेली बड़ी, नखशिव देखिये ॥ विषही के जर मूल, विषही के डार पात ॥ विषहीके फूल फल, लागे जु विशोखिये ॥ विषके तंतू पसार, उरमाईँ छांटी मार ॥ सब नर-वृक्ष पर, लपटेहि लेखिये ॥ “सुन्दर” कहत, कोज सन्त-तरु बचिये ॥ तिनके तौ कई, लता लागि नहि पेखिये ॥

( २ )

कामिनीको अंग, अति मलिन महा अशुद्ध ॥ रोम-रोम मलिन, मलिन सब द्वार हैं ॥ हाड, माँस मज्जा मेद, चामसँ लपेट राखे ॥ ठौर-ठौर रक्तके, भरेईं भंडार हैं ॥ मूवह-पुरीष-छांत, एकमेक मिल रहीं ॥ औरह उदर माँहि, विविध विकार हैं ॥ “सुन्दर” कहत, नारी नखशिव निधरूप ॥ ताहि जो सराहै, सो तौ बड़ोईँ गँवार है ॥

( २३१ )

( ३ )

रसिकप्रिया रसमंजरी, और यूंगारहि जान । चतुराई करि बहुत विधि, विषय बनाई आन ॥ विषय बनाई आन, लगत विषयिनकूँ प्यारी । जागे मदन प्रचण्ड, सराहै नखाशिव नारी ॥ ज्यों रोगी मिष्टाच खाइ, रोगहि विस्तारै । “सुन्दर” ये गति होइ, जोइ रसिकप्रिया धारै ॥

विषकी ज़मीनमें विषके अङ्कुर जमे । फिर नारी रूपी विष- लता बढ़ी । उस लतामें विषकी जड़ें लगीं और विषका डालियाँ और पत्तियाँ आईं । फिर उस लतामें विषके ही फल और फूल लगे । उस विषलतामेंसे विषके तन्तु निकले । फिर उस लताने अपने विष-तन्तु फैलाकर नर-वृक्षोंको इलभा लिया और खुद उनके लिपट गई । सुन्दरदासजी कहते हैं, उस विषलताके फन्देमें अधिकांश नररूपी वृक्ष फँस गये—कोई विरले ही सन्तरूपी वृक्ष उससे अछूते बच सके । उनके ही शरीरोंमें यह विष लता लगी हुई न दिखाई दी ।

मतलब यह है, कि खो विषकी बेल है । उसकी जड़, उसकी डालियाँ, उसकी पत्तियाँ और उसके फल-फूल सभी विषपूर्ण हैं । सारांश यह कि, खीका सन्वाङ्ग विषसे भरा है । खीका कोई भी अंग ऐसा नहीं जिसमें विष न हो । यह खो रूपी विषबेल अज्ञानी विषयी लोगोंको अपने फन्देमें फँसाकर नाश कर देती

( २३० )

मित्रोंसे प्रीति नहीं करते, किन्तु फूटे और कुराहमें ले जानेवालोंसे प्रीति करते हैं। महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है:—

( १ )

विषही की भूमि मैंहि, विषके अंकुर भये । नारी-विषवेली बढी, नखशिव देखिये ॥ विषही के जर मूल, विषही के डार पात । विषहीके फूल फल, लागे जु विशेषिये ॥ विषके तंतू पसार, उरफाईं आटी मार । सब नर-वृक्ष पर, लपटेहि लेखिये ॥ “सुन्दर” कहत, कोज सन्त-तरु बचिये । तिनके तौ कहैं, लता लागि नहि पेखिये ॥

( २ )

कामिनीको अंग, अति मलिन महा अशुद्ध । रोम-रोम मलिन, मलिन सब द्वार हैं ॥ हाडू माँस मज्जा मेद, चामसैं लपेट राखे । ठौर-ठौर रक्तके, भरेई भंडार हैं ॥ मूलहू-पुरीष-आत, एकमेक मिल रही । औरहू उदर मैंहि, विविध विकार हैं ॥ “सुन्दर” कहत, नारी नक्षत्रशिव निधरूप । ताहि जो सराहै, सो तौ बढोई गँवार है ॥