वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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60. O my mind, do thou give up, all attachment now and cherish at heart a deep love for the Great Shiva, who bears the new moon in his forehead and take up thy sojourn on the land by the side of the heavenly river Ganges. Who ever trusts the currents of the ocean, the bubbles of water, the streaks of lightning, women, the flames of burning fires, serpents and the flow of rivers, all of which are uncertain in their conduct ?
अथे गीतं सरसकवयः पारवतो दाक्षिणात्याः
पृष्ठे लीलावलयरणितं चामर्याहिणीनाम् ॥
ययास्त्येवं कुरु भवरसास्वादने लंपटस्तवं नो
चेच्छतः प्रविश सहसा निर्विकल्पे समाधौ ॥१॥
हे मन ! तेरे सामने चतुर गँवैये गाते हों, दाहिने-बायें दक्खन देशके उत्तम कवि सरस काव्य सुनाते हों, तेरे पीछे चँवर ढोलने वाली सुन्दरी स्त्रियोंके कंकलोंकी मधुर भनकार होता है,—
स्वतिकासन आदि । शम=इन्द्रिय-निग्रह, इन्द्रिय वश करना । दम=बाहरी इन्द्रियोंका निग्रह ; तपस्याके क्लेश सहनेकी शक्ति । विराग=ममता-त्याग ; विरक्ति ; हंसारमें आसक्ति न रखना । भोग-विराग=छो आदिमें आसक्ति न रखना । त्याग=वैराग्य । अनुसरि=अनुवर्त्तन कर, पीछे चलो । कृथा विषय-बकवाद्=फिज़ूल गपथाप, व्यर्थकी बातें बताना । स्वाद=जायके । परिहरि=छोड़, त्याग । थिर=स्थिर । तरंग=लहर । बुदबुद=बुलबुल । तडित=बिजली । अगिन-शिखा=आगकी लो । पक्षग=सर्प । सरित=नदी । त्यौही=उसी तरह । तन=शरीर । जोवन=, यौवन, जवानी । अथिर=चंचल । चल=चंचल । दलदल=भसान ।