वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 323, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें(( २२६ ))
जब भगवानमें तेरा मन लग जाय, तब संसारकी तरफ-से मुँह फेर ले—संसारको पीठ दे-दे, जिससे तेरे मनमें लोक-वासना न आने पावे ; क्योंकि वासनासे हृदयकी दृष्टि मेली हो जाती है। साँपका भोतरी चमड़ा जब मोटा हो जाता है, तब उसे आँखोंसे साफ नहीं दीखता ; लेकिन जब वह काँचली छोड़ देता है, तब उसकी आँखोंका पटल उतर जाता है ; आँखोंके साफ हो जानेसे साँपको खूब साफ दीखने लगता है। जिस तरह काँचली त्यागनेसे सर्पकी दृष्टि साफ हो जाती है ; उसी तरह वासना त्याग देनेसे ईश्वरके भक्तोंकी हृदय-दृष्टि साफ रहती और उन्हें भगवानके दर्शन होते रहते हैं।
छप्पय ।
मोह छाँड़ मन-मीत ! शीति सों चन्द्रचूड़ भज ! सुर-सरिताके तीर, धीरे घर दृढ़ आसन सज !! शम दम भोग-विराग, त्याग तपको—तू अशुसरि । वृथा विषय-बकवाद, स्वाद सबही—तू परिहरि ॥ थिर नहि तरंग, बुद्धुद, तडित, अगिन-शिखा, पन्तग, सरित । त्यौही तन जोवन धन अथिर, चल दलदल कैसे चरित ॥६०॥
मन मीत—हे मन-मित्र ! प्रीतिसे—प्रेमसे । चन्द्रचूड़—चन्द्रभोज, मन्दभौलि, चन्द्रशेखर, शिव, महादेव । भज—भजन कर । सुर-सरिता=देवताओंकी नदी, गङ्गा । आसन=योगियोंके बैठनेका प्रकार ; पद्मासन