भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २३१ )

( ३ )

रसिकप्रिया रसमंजरी, और यूंगारहि जान । चतुराई करि बहुत विधि, विषय बनाई आन ॥ विषय बनाई आन, लगत विषयिनकूँ प्यारी । जागे मदन प्रचण्ड, सराहै नखाशिव नारी ॥ ज्यों रोगी मिष्टाच खाइ, रोगहि विस्तारै । “सुन्दर” ये गति होइ, जोइ रसिकप्रिया धारै ॥

विषकी ज़मीनमें विषके अङ्कुर जमे । फिर नारी रूपी विष- लता बढ़ी । उस लतामें विषकी जड़ें लगीं और विषका डालियाँ और पत्तियाँ आईं । फिर उस लतामें विषके ही फल और फूल लगे । उस विषलतामेंसे विषके तन्तु निकले । फिर उस लताने अपने विष-तन्तु फैलाकर नर-वृक्षोंको इलभा लिया और खुद उनके लिपट गई । सुन्दरदासजी कहते हैं, उस विषलताके फन्देमें अधिकांश नररूपी वृक्ष फँस गये—कोई विरले ही सन्तरूपी वृक्ष उससे अछूते बच सके । उनके ही शरीरोंमें यह विष लता लगी हुई न दिखाई दी ।

मतलब यह है, कि खो विषकी बेल है । उसकी जड़, उसकी डालियाँ, उसकी पत्तियाँ और उसके फल-फूल सभी विषपूर्ण हैं । सारांश यह कि, खीका सन्वाङ्ग विषसे भरा है । खीका कोई भी अंग ऐसा नहीं जिसमें विष न हो । यह खो रूपी विषबेल अज्ञानी विषयी लोगोंको अपने फन्देमें फँसाकर नाश कर देती