वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २३० )
मित्रोंसे प्रीति नहीं करते, किन्तु भूठे और कुराहमें ले जानेवालोंसे प्रीति करते हैं। महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है:—
( १ )
विषही की भूमि माँहि, विषके अंकुर भये ॥ नारी-विषवेली बड़ी, नखशिव देखिये ॥ विषही के जर मूल, विषही के डार पात ॥ विषहीके फूल फल, लागे जु विशोखिये ॥ विषके तंतू पसार, उरमाईँ छांटी मार ॥ सब नर-वृक्ष पर, लपटेहि लेखिये ॥ “सुन्दर” कहत, कोज सन्त-तरु बचिये ॥ तिनके तौ कई, लता लागि नहि पेखिये ॥
( २ )
कामिनीको अंग, अति मलिन महा अशुद्ध ॥ रोम-रोम मलिन, मलिन सब द्वार हैं ॥ हाड, माँस मज्जा मेद, चामसँ लपेट राखे ॥ ठौर-ठौर रक्तके, भरेईं भंडार हैं ॥ मूवह-पुरीष-छांत, एकमेक मिल रहीं ॥ औरह उदर माँहि, विविध विकार हैं ॥ “सुन्दर” कहत, नारी नखशिव निधरूप ॥ ताहि जो सराहै, सो तौ बड़ोईँ गँवार है ॥