भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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और क्षणस्थायी है। वह ऐसा सुख नहीं, जो सदा रहे। परिणाममें, उससे अनेक प्रकारके दुःख होते हैं। जो सुख अतित्य है, शेषमें दुःखोंका मूल और शोभोंकी खान है, उस सुखको सुख समझना, बुद्धिमानोंका काम नहीं। अगर आपको सद्गुण ही करना है, तो आप सद्धानुभूति, परोपकार-वृत्ति एवं प्रज्ञारूपी वह के साथ सद्गुण कीजिये। इनके साथ सद्गुण और प्रीति करने से आप को नित्य सुख मिलेगा; ऐसा सुख मिलेगा, जो इस लोक और परलोक में सदा स्थिर रहेगा।

जिन लोगों ने पहले दूसरों के दुःख दूर किये हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए जाने दी हैं, जिन्होंने ज्ञान से काम लिया है, उनका भला ही हुआ है। अगर आप स्त्री-सुख में भूले रहोगे, तो जब आपको नरक की भयङ्कर यातनायें भोगनी पड़ेगी, जब आप पर यमदूतोंके डण्डे पड़ेगे, उस समय क्या खियोंके हारों से सुशोभित स्तन-मण्डल और कर्धनियोंसे शोभायमान पतली कमरें आपकी रक्षा कर सकेंगी? नहीं, इनसे कोई लाभ न होगा; उस समय ये आड़े न आयेंगे। उस मौकेपर, परोपकार करके जो पुण्य संचय किया होगा, वही आपकी रक्षा करेगा। बुद्धिसे काम लोगे तो भला होगा; क्योंकि बुद्धि ही आपको नरकसे बचनेकी राह बतावेगी; किन्तु स्त्री तो आपको स्त्री नरककी राह दिखावेगी। आश्चर्य है, कि अज्ञानी लोग अच्छे को बुरा और बुरेको अच्छा समझते हैं। वे अपने सच्चे-