वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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मित्रोंसे प्रीति नहीं करते, किन्तु फूटे और कुराहमें ले जानेवालोंसे प्रीति करते हैं। महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है:—
( १ )
विषही की भूमि मैंहि, विषके अंकुर भये । नारी-विषवेली बढी, नखशिव देखिये ॥ विषही के जर मूल, विषही के डार पात । विषहीके फूल फल, लागे जु विशेषिये ॥ विषके तंतू पसार, उरफाईं आटी मार । सब नर-वृक्ष पर, लपटेहि लेखिये ॥ “सुन्दर” कहत, कोज सन्त-तरु बचिये । तिनके तौ कहैं, लता लागि नहि पेखिये ॥
( २ )
कामिनीको अंग, अति मलिन महा अशुद्ध । रोम-रोम मलिन, मलिन सब द्वार हैं ॥ हाडू माँस मज्जा मेद, चामसैं लपेट राखे । ठौर-ठौर रक्तके, भरेई भंडार हैं ॥ मूलहू-पुरीष-आत, एकमेक मिल रही । औरहू उदर मैंहि, विविध विकार हैं ॥ “सुन्दर” कहत, नारी नक्षत्रशिव निधरूप । ताहि जो सराहै, सो तौ बढोई गँवार है ॥