भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २२३ )

“पिताजी ! मनुष्य अन्ध्या किस पाप से होता है ?” पिताने उत्तर दिया—“पुत्र ! जो पूर्व जन्ममें रत्नोंकी चोरी करता है, वह अन्ध्या होता है ।” पुत्रने कहा—“पिताजी ! यह बात नहीं है । कारण के गुण कार्यमें भी आ जात हैं । आप अन्धे हैं, इसीसे मैं भी अन्ध्या हुआ हूँ ।” पिताने क्रोधमें भरकर कहा “नालायक, मैं अन्ध्या कैसे ?” पुत्रने कहा—“पिताजी ! गंगा-माता साक्षात् मुक्ति देनेवाली हैं । आपने उनकी उपासना पुत्रकी कामना से की ; इसी से मैं आपको अन्ध्या संसकता हूँ । जो वेद-शास्त्र पढ़ कर भी पेशाव के कीड़े की इच्छा करता है, वह अन्ध्या नहीं तो क्या सूक्ष्मता है ? पेशाव से जैसे और अनेक प्रकार के कीड़े पैदा होते हैं, वैसे ही पुत्र भी उसका एक कीड़ा ही है । आपने जिस पुत्र के लिये गंगाजी की इतनी तपस्या की, वह पुत्र तो कुत्ते-बिल्ली और सूअर प्रभृति पशुओं के अनायास ही हो जाते हैं । पुत्र-जैसे मूत्र के कीड़े से किसी को भी स्वर्ग या मोक्ष लाभ नहीं हो सकता ; पिताजी ! न कोई किसीका पुत्र है न स्त्री प्रभृति ; सब एक ही हैं, क्योंकि सबमें एक ही आत्मा है । वही आत्मा पितामें है, वही पुत्र और स्त्रीमें । जिस तरह मरुभूमिमें भ्रमसे जल दीखता है, पर वास्तवमें वहाँ जलका नाम-निशान भी नहीं ; उसी तरह भ्रमसे यह जगत् सच्चा दीखता है, पर वास्तवमें कुछ भी नहीं । यह मेरा पुत्र है, यह मेरी स्त्री है, यह मेरा धन है, यह मेरा मकान है—ऐसा वासनासे दीखता है । वासना