भारतकोश
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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( २२३ )

“पिताजी ! मनुष्य अन्ध्या किस पाप से होता है ?” पिताने उत्तर दिया—“पुत्र ! जो पूर्व जन्ममें रत्नोंकी चोरी करता है, वह अन्ध्या होता है ।” पुत्रने कहा—“पिताजी ! यह बात नहीं है । कारण के गुण कार्यमें भी आ जात हैं । आप अन्धे हैं, इसीसे मैं भी अन्ध्या हुआ हूँ ।” पिताने क्रोधमें भरकर कहा “नालायक, मैं अन्ध्या कैसे ?” पुत्रने कहा—“पिताजी ! गंगा-माता साक्षात् मुक्ति देनेवाली हैं । आपने उनकी उपासना पुत्रकी कामना से की ; इसी से मैं आपको अन्ध्या संसकता हूँ । जो वेद-शास्त्र पढ़ कर भी पेशाव के कीड़े की इच्छा करता है, वह अन्ध्या नहीं तो क्या सूक्ष्मता है ? पेशाव से जैसे और अनेक प्रकार के कीड़े पैदा होते हैं, वैसे ही पुत्र भी उसका एक कीड़ा ही है । आपने जिस पुत्र के लिये गंगाजी की इतनी तपस्या की, वह पुत्र तो कुत्ते-बिल्ली और सूअर प्रभृति पशुओं के अनायास ही हो जाते हैं । पुत्र-जैसे मूत्र के कीड़े से किसी को भी स्वर्ग या मोक्ष लाभ नहीं हो सकता ; पिताजी ! न कोई किसीका पुत्र है न स्त्री प्रभृति ; सब एक ही हैं, क्योंकि सबमें एक ही आत्मा है । वही आत्मा पितामें है, वही पुत्र और स्त्रीमें । जिस तरह मरुभूमिमें भ्रमसे जल दीखता है, पर वास्तवमें वहाँ जलका नाम-निशान भी नहीं ; उसी तरह भ्रमसे यह जगत् सच्चा दीखता है, पर वास्तवमें कुछ भी नहीं । यह मेरा पुत्र है, यह मेरी स्त्री है, यह मेरा धन है, यह मेरा मकान है—ऐसा वासनासे दीखता है । वासना

( २२४ )

से ही जीव संसार-बन्धनमें बँधता है ; यानी वासनासे ही शरीर धारण करता है। वासनासे ही मनुष्य अज्ञानी बन रहा है। वासनाका त्याग करते ही मनुष्य, ज्ञान-लाभ करके, परमानन्द की प्राप्ति करता है। ज्ञानी सच्चिदानन्द रूप ब्रह्मको ज्ञान की आँखोंसे देखता है, पर अज्ञानी उसे नहीं देख सकता। जैसे अन्येको सूर्य नहीं दीखता, उसी तरह अज्ञानीको ब्रह्म नहीं दीखता ; इसीसे अज्ञानीको, बाहरकी आँखें होनेपर भी अन्या कहते हैं। आप भेद-बुद्धिको त्याग कर, सबमें एक आत्माको देखो। आत्मज्ञानी होनेसे ही आपको नित्य सुख मिलेगा।”

पिता-पुत्रके अगाध पाण्डित्य और ज्ञानको देख एकदम चकित हो गया और कहने लगा—“पुत्र ! मैंने चार वेद, छहों शास्त्र, उपनिषद्, स्मृति और पुराण प्रभृति पढ़कर कुछ भी ज्ञान लाभ न किया ; तेरी बातोंसे मेरी आँखें खुल गईं।”

संसारको मिथ्या समझकर ही कोई ज्ञानी कहता है :—

“हे मन ! तू स्त्रीके प्रेममें मत भूल ; यह बिजलीकी चमक, नदीके प्रवाह और नदीकी तरङ्ग प्रभृतिकी तरह चञ्चल है। स्त्रीके प्रेमको कोई ठिकाना नहीं ; आज यह तेरी है, कल पराई है। एक करवट बदलनेमें स्त्री पराई हो जाती है। इसकी कूछी प्रीतिमें कोई लाभ नहीं। गोरुबामी तुलसीदासजी कहते हैं :—

( २२५ )

उरग तुरग नारी रूपाति, नर नीचो हथियार । तुलसी परखत रहब नित, इनाहँ न पलटत बार ॥

सर्प, घोड़ा, खी, राजा, नाच पुरुष और हथियार—इनको सदा परखते रहना चाहिये, इनसे कभी ग्राफ़िल न रहना चाहिये, क्योंकि इन्हें पलटते देर नहीं लगती ।

हे मन ! यदि तुझे प्रीति ही करनी है, तो उठ, गङ्गा-किनारेके चूड़ों के नीचे : चल बैठ और आशुतोष भगवान् चन्द्रशेखर— शिवजीसे प्रीति कर । उनको प्रीति सच्ची और कल्याणकारी है ।

गोस्वामीजीने और भी कहा है:—

कै ममता कर रामपद, कै ममता कर हेल । “तुलसी” दो मैंहँ एक अब, खेल छाँड़ि छल खेल ॥ सम्मुख हवै रघुनाथके, देह सकल जग पीठि । तजै कैजुरी उरग कहँ, हेत अधिक अति दीठि ॥

या तो भगवान्के चरणोंमें ममता कर अथवा देहके सब नातोंको त्यागकर उदासीन हो जा और कर्म ज्ञानादि साधन करके मनको शुद्ध कर ले । जब तेरा मन शुद्ध हो जायगा, तब भगवान्के चरणोंमें आप ही स्नेह हो जायगा । इन दोनों बातोंमें से जो एक बात तुझे पसन्द हो, उसे छल छोड़कर दिलसे कर ; एक खेल-खेल । सारांश यह, कि भगवान्में सहज स्नेह कर । अगर तेरा मन प्रभुकी भक्तिमें नहीं जमता, तो खी-पुत्र आदि संसारी भोगोंसे मन हटाकर, प्रभुकी भक्तिकी चैष्टा कर ।

१५

(( २२६ ))

जब भगवानमें तेरा मन लग जाय, तब संसारकी तरफ-से मुँह फेर ले—संसारको पीठ दे-दे, जिससे तेरे मनमें लोक-वासना न आने पावे ; क्योंकि वासनासे हृदयकी दृष्टि मेली हो जाती है। साँपका भोतरी चमड़ा जब मोटा हो जाता है, तब उसे आँखोंसे साफ नहीं दीखता ; लेकिन जब वह काँचली छोड़ देता है, तब उसकी आँखोंका पटल उतर जाता है ; आँखोंके साफ हो जानेसे साँपको खूब साफ दीखने लगता है। जिस तरह काँचली त्यागनेसे सर्पकी दृष्टि साफ हो जाती है ; उसी तरह वासना त्याग देनेसे ईश्वरके भक्तोंकी हृदय-दृष्टि साफ रहती और उन्हें भगवानके दर्शन होते रहते हैं।

छप्पय ।

मोह छाँड़ मन-मीत ! शीति सों चन्द्रचूड़ भज ! सुर-सरिताके तीर, धीरे घर दृढ़ आसन सज !! शम दम भोग-विराग, त्याग तपको—तू अशुसरि । वृथा विषय-बकवाद, स्वाद सबही—तू परिहरि ॥ थिर नहि तरंग, बुद्धुद, तडित, अगिन-शिखा, पन्तग, सरित । त्यौही तन जोवन धन अथिर, चल दलदल कैसे चरित ॥६०॥

मन मीत—हे मन-मित्र ! प्रीतिसे—प्रेमसे । चन्द्रचूड़—चन्द्रभोज, मन्दभौलि, चन्द्रशेखर, शिव, महादेव । भज—भजन कर । सुर-सरिता=देवताओंकी नदी, गङ्गा । आसन=योगियोंके बैठनेका प्रकार ; पद्मासन

( २२७ )

60. O my mind, do thou give up, all attachment now and cherish at heart a deep love for the Great Shiva, who bears the new moon in his forehead and take up thy sojourn on the land by the side of the heavenly river Ganges. Who ever trusts the currents of the ocean, the bubbles of water, the streaks of lightning, women, the flames of burning fires, serpents and the flow of rivers, all of which are uncertain in their conduct ?

अथे गीतं सरसकवयः पारवतो दाक्षिणात्याः

पृष्ठे लीलावलयरणितं चामर्याहिणीनाम् ॥

ययास्त्येवं कुरु भवरसास्वादने लंपटस्तवं नो

चेच्छतः प्रविश सहसा निर्विकल्पे समाधौ ॥१॥

हे मन ! तेरे सामने चतुर गँवैये गाते हों, दाहिने-बायें दक्खन देशके उत्तम कवि सरस काव्य सुनाते हों, तेरे पीछे चँवर ढोलने वाली सुन्दरी स्त्रियोंके कंकलोंकी मधुर भनकार होता है,—

स्वतिकासन आदि । शम=इन्द्रिय-निग्रह, इन्द्रिय वश करना । दम=बाहरी इन्द्रियोंका निग्रह ; तपस्याके क्लेश सहनेकी शक्ति । विराग=ममता-त्याग ; विरक्ति ; हंसारमें आसक्ति न रखना । भोग-विराग=छो आदिमें आसक्ति न रखना । त्याग=वैराग्य । अनुसरि=अनुवर्त्तन कर, पीछे चलो । कृथा विषय-बकवाद्=फिज़ूल गपथाप, व्यर्थकी बातें बताना । स्वाद=जायके । परिहरि=छोड़, त्याग । थिर=स्थिर । तरंग=लहर । बुदबुद=बुलबुल । तडित=बिजली । अगिन-शिखा=आगकी लो । पक्षग=सर्प । सरित=नदी । त्यौही=उसी तरह । तन=शरीर । जोवन=, यौवन, जवानी । अथिर=चंचल । चल=चंचल । दलदल=भसान ।

( २२८ )

यदि ऐसे सामान तुम्हे मयस्सर हों, तो तू संसार-रसात्वादनमें मग्न हो ; नहीं तो सबका ध्यान छोड़, निर्विकल्प समाधिमें लीन हो ॥६१॥

61. If thou hast in thy front the singing of the musicians, on thy sides the reciting of elegant poetry by learned southerners, behind thee the tinkling sound of the anklets of maids waving chamars, then there may not be any objection to thy giving up thyself to the enjoyment of worldly pleasures. But if, O mind, thou hast not all these things, it behoves thee at once to enter into the Nirvikalpa Samadhi (meditation of God without thinking of anything else).

विरमत बुधा योषितसंगात्सुवात्त्वगभंगुरा-

त्कुरुत कुरुणामैवीपज्ञावधूजनसंगमम् ॥

न खलु नरके हाराक्रान्तं धनस्तनमण्डलं

शरणमथवा श्रोणीविम्बं रगान्मथिमेखलम् ॥६२॥

हे बुद्धिमानो ! स्त्रियोंके संगसे बचो, क्योंकि उनके संगसे जो सुख मिलता है, वह क्षणिक है। आप मैत्री, कुरुणा और बुद्धिरूपी बधूके साथ संगम करो। जिस समय नरकमें सजा मिलेगी, उस समय युवतियोंके हारेसे शोभित स्तनद्वय और उनकी चूँवरोंदार कर्धनियों से सुशोभित कमरे तुम्हारी सहायता न करेंगी ॥६२॥

मनुष्यो, स्त्रियोंमें मन मत लगाओ। उनके साथ रहने, उनके साथ संगम करनेसे सुख होता है ; पर वह सुख नश्वर

( २२६ )

और क्षणस्थायी है। वह ऐसा सुख नहीं, जो सदा रहे। परिणाममें, उससे अनेक प्रकारके दुःख होते हैं। जो सुख अतित्य है, शेषमें दुःखोंका मूल और शोभोंकी खान है, उस सुखको सुख समझना, बुद्धिमानोंका काम नहीं। अगर आपको सद्गुण ही करना है, तो आप सद्धानुभूति, परोपकार-वृत्ति एवं प्रज्ञारूपी वह के साथ सद्गुण कीजिये। इनके साथ सद्गुण और प्रीति करने से आप को नित्य सुख मिलेगा; ऐसा सुख मिलेगा, जो इस लोक और परलोक में सदा स्थिर रहेगा।

जिन लोगों ने पहले दूसरों के दुःख दूर किये हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए जाने दी हैं, जिन्होंने ज्ञान से काम लिया है, उनका भला ही हुआ है। अगर आप स्त्री-सुख में भूले रहोगे, तो जब आपको नरक की भयङ्कर यातनायें भोगनी पड़ेगी, जब आप पर यमदूतोंके डण्डे पड़ेगे, उस समय क्या खियोंके हारों से सुशोभित स्तन-मण्डल और कर्धनियोंसे शोभायमान पतली कमरें आपकी रक्षा कर सकेंगी? नहीं, इनसे कोई लाभ न होगा; उस समय ये आड़े न आयेंगे। उस मौकेपर, परोपकार करके जो पुण्य संचय किया होगा, वही आपकी रक्षा करेगा। बुद्धिसे काम लोगे तो भला होगा; क्योंकि बुद्धि ही आपको नरकसे बचनेकी राह बतावेगी; किन्तु स्त्री तो आपको स्त्री नरककी राह दिखावेगी। आश्चर्य है, कि अज्ञानी लोग अच्छे को बुरा और बुरेको अच्छा समझते हैं। वे अपने सच्चे-

( २३० )

मित्रोंसे प्रीति नहीं करते, किन्तु भूठे और कुराहमें ले जानेवालोंसे प्रीति करते हैं। महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है:—

( १ )

विषही की भूमि माँहि, विषके अंकुर भये ॥ नारी-विषवेली बड़ी, नखशिव देखिये ॥ विषही के जर मूल, विषही के डार पात ॥ विषहीके फूल फल, लागे जु विशोखिये ॥ विषके तंतू पसार, उरमाईँ छांटी मार ॥ सब नर-वृक्ष पर, लपटेहि लेखिये ॥ “सुन्दर” कहत, कोज सन्त-तरु बचिये ॥ तिनके तौ कई, लता लागि नहि पेखिये ॥

( २ )

कामिनीको अंग, अति मलिन महा अशुद्ध ॥ रोम-रोम मलिन, मलिन सब द्वार हैं ॥ हाड, माँस मज्जा मेद, चामसँ लपेट राखे ॥ ठौर-ठौर रक्तके, भरेईं भंडार हैं ॥ मूवह-पुरीष-छांत, एकमेक मिल रहीं ॥ औरह उदर माँहि, विविध विकार हैं ॥ “सुन्दर” कहत, नारी नखशिव निधरूप ॥ ताहि जो सराहै, सो तौ बड़ोईँ गँवार है ॥

( २३१ )

( ३ )

रसिकप्रिया रसमंजरी, और यूंगारहि जान । चतुराई करि बहुत विधि, विषय बनाई आन ॥ विषय बनाई आन, लगत विषयिनकूँ प्यारी । जागे मदन प्रचण्ड, सराहै नखाशिव नारी ॥ ज्यों रोगी मिष्टाच खाइ, रोगहि विस्तारै । “सुन्दर” ये गति होइ, जोइ रसिकप्रिया धारै ॥

विषकी ज़मीनमें विषके अङ्कुर जमे । फिर नारी रूपी विष- लता बढ़ी । उस लतामें विषकी जड़ें लगीं और विषका डालियाँ और पत्तियाँ आईं । फिर उस लतामें विषके ही फल और फूल लगे । उस विषलतामेंसे विषके तन्तु निकले । फिर उस लताने अपने विष-तन्तु फैलाकर नर-वृक्षोंको इलभा लिया और खुद उनके लिपट गई । सुन्दरदासजी कहते हैं, उस विषलताके फन्देमें अधिकांश नररूपी वृक्ष फँस गये—कोई विरले ही सन्तरूपी वृक्ष उससे अछूते बच सके । उनके ही शरीरोंमें यह विष लता लगी हुई न दिखाई दी ।

मतलब यह है, कि खो विषकी बेल है । उसकी जड़, उसकी डालियाँ, उसकी पत्तियाँ और उसके फल-फूल सभी विषपूर्ण हैं । सारांश यह कि, खीका सन्वाङ्ग विषसे भरा है । खीका कोई भी अंग ऐसा नहीं जिसमें विष न हो । यह खो रूपी विषबेल अज्ञानी विषयी लोगोंको अपने फन्देमें फँसाकर नाश कर देती

( २३० )

मित्रोंसे प्रीति नहीं करते, किन्तु फूटे और कुराहमें ले जानेवालोंसे प्रीति करते हैं। महात्मा सुन्दरदासजीने कहा है:—

( १ )

विषही की भूमि मैंहि, विषके अंकुर भये । नारी-विषवेली बढी, नखशिव देखिये ॥ विषही के जर मूल, विषही के डार पात । विषहीके फूल फल, लागे जु विशेषिये ॥ विषके तंतू पसार, उरफाईं आटी मार । सब नर-वृक्ष पर, लपटेहि लेखिये ॥ “सुन्दर” कहत, कोज सन्त-तरु बचिये । तिनके तौ कहैं, लता लागि नहि पेखिये ॥

( २ )

कामिनीको अंग, अति मलिन महा अशुद्ध । रोम-रोम मलिन, मलिन सब द्वार हैं ॥ हाडू माँस मज्जा मेद, चामसैं लपेट राखे । ठौर-ठौर रक्तके, भरेई भंडार हैं ॥ मूलहू-पुरीष-आत, एकमेक मिल रही । औरहू उदर मैंहि, विविध विकार हैं ॥ “सुन्दर” कहत, नारी नक्षत्रशिव निधरूप । ताहि जो सराहै, सो तौ बढोई गँवार है ॥

( २३१ )

( ३ )

रसिकप्रिया रसमंजरी, और शृंगारहि जान । चतुराई करि बहुत विधि, विषय बनाई आन ॥ विषय बनाई आन, लगत विषयिनकँ प्यारी । जागे मदन प्रचण्ड, सराहै नखशिख नारी ॥ ज्यों रोगी मिष्टाव खाइ, रोगहि विस्तारै । “सुन्दर” ये गति होइ, जोइ रसिकप्रिया धारै ॥

विषकी ज़मीनमें विषके अङ्कुर जमे । फिर नारी रूपी विष- लता बढ़ी । उस लतामें विषकी जड़ें लगीं और विषका डालियाँ और पत्तियाँ आईं । फिर उस लतामें विषके ही फल और फूल लगे । उस विषलतामेंसे विषके तन्तु निकले । फिर उस लताने अपने विष-तन्तु फैला फैलाकर नर-वृक्षोंको इलझा लिया और खुद उनके लिपट गई । सुन्दरदासजी कहते हैं, उस विषलताके फन्देमें अधिकांश नररूपी वृक्ष फँस गये—कोई विरले ही सन्तरूपी वृक्ष उससे अछूते बच सके । उनके ही शरीरोंमें यह विष लता लगी हुई न दिखाई दी ।

मतलब यह है, कि खी विषकी बेल है । उसकी जड़, उसकी डालियाँ, उसकी पत्तियाँ और उसके फल-फूल सभी विषपूर्ण हैं । सारांश यह कि, खीका सम्बन्ध विषसे भरा है । खीका कोई भी अंग ऐसा नहीं जिसमें विष न हो । यह खी रूपी विषबेल अज्ञानी विषयी लोगोंको अपने फन्देमें फँसाकर नाश कर देती

( २३२ )

है ; क्योंकि विष स्वभावसे ही प्राणशक्ती होता है । सिर्फ वे लोग इस स्त्री-रूपी विष-बेलसे बचते हैं, जो ज्ञानी हैं, जो इसकी असलियतको जानते हैं, जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें कर लिया है, जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंकी तरफ नहीं झुकतीं । और भी खुलासा यह है, कि स्त्री विष-लताके समान है, विष-लता जिस वृक्षके लिपट जाती है, उसे सुखा-सुखाकर नष्ट कर देती है । इसी तरह स्त्री जिस विषयी पुरुषके पीछे लग जाती है अथवा जो पुरुष स्त्रीके फन्देमें फँस जाता है, वह भी सब तरहसे नष्ट हो जाता है । इसके सभी अंगोंमें विष भरा है । जिस तरह विष खानेसे जहर बढ़ता है ; उसी तरह इसकी आँख, इसके गाल, इसकी भौं, इसकी छातियाँ और जाँघें प्रभृति किसी भी अंगके देखने और छूनेसे विष बढ़ जाता है । विषके बढ़ जानेसे पुरुष मतवाला हो जाता है ; उसके होश-हवास क्षता हो जाते और बुद्धि मारी जाती है । बुद्धिके मारे जानेसे पुरुष बिना पत-वारकी नावकी तरह नष्ट हो जाता है । इस लोकमें नाना प्रकारके रोग और दुःख भोगकर मर जाता और परलोकमें भी दुःख ही पाता है । संखिया प्रभृति विषोंका मारा हुआ इसी लोकमें दुःख पाता है । पर इस स्त्री-विषका मारा हुआ अनेक जन्मोंमें दुःख पाता है । और जहर खानेवाला एक ही बार मरता है ; पर स्त्री-विष सेवन करने वाला बारम्बार मरता है । अतः बुद्धिमानोंको इस स्त्री-रूपी विषलतासे सदा दूर रहना चाहिये, ताकि इसका विष शरीरमें पेवस्त न होने पावे ।

( २३३ )

( २ )

स्त्रीका शरीर अत्यन्त मैला और अतीव अशुद्ध या गन्दा है। इसका प्रत्येक रोम मैला और सारे ही दरवाजे गन्दे हैं। इसका शरीर हाड़, मांस, मज्जा, मेद और चमड़ेसे लिपटा हुआ है। इसके अन्दर जगह-जगह खूनके होड़ भरे हुए हैं। पेशाब और पाखाने की आँति आपसमें सट रही हैं। इन सबके अलावा, पेटमें और भी अनेक तरहके मैले भरे हुए हैं। सुन्दरदास जी कहते हैं, नारी एड़ीसे चौटी तक निन्द्य है—नखसे शिख तक निन्दा करने योग्य है। ऐसी निन्दाकी पात्री नारीकी जो सराहना करते हैं, वे तो निश्चय ही बड़े गवार और भौढ़ हैं।

खुलासा यह है कि, स्त्री ऊपरसे अच्छी मालूम होती है, पर वास्तवमें गन्दगीका पिटारा है। इसकी नाकमें रहूँट भरा हुआ है। इसकी आँखोंमें गीड़े भरी हुई हैं। इसके मुँहमें कफ और खवार भरे हुए हैं। इसकी मूत्रेन्द्रियसे हर समय सफेद-सफेद या लाल-लाल गन्दा पदार्थ बहा करता है। पेशाबसे जाँवे भीगी रहती हैं। इसकी मल और मूत्र त्यागने की इन्द्रियोंमें दो अंगुलसे त्रिषादा दूर का फर्क नहीं है। जिन छातियोंपर विषयी मरे मिटते हैं, जिन्हें वे सुन्दर सोनेके कलशे, कामदेवके नगाड़े अथवा शन्तरे और अनार कहते हैं, वे दो मांसके लौदे हैं। उनके ऊपर चमड़ा चढ़ा हुआ है, इसीसे उनके भीतरकी गन्दगी छिपी रहती है। ऐसी गन्दगीकी पिटारीकी

( २३४ )

तारीकोंमें जो लोग कविताएँ करते हैं, वे समझच ही बेअकल और गँवार हैं ।

( ३ )

अनेक तरहकी इन्द्रिय-भोग-सम्बन्धी वस्तुओंसे बनी हुई और सजी हुई स्त्री विषयी लोगोंको बहुत ही प्यारी लगती है । जब बलवान काम जागता है, तब वे इसका नखशिश वर्णन करनेमें अपनी सारी विद्वत्ता खर्च कर देते हैं । चोटोंसे पड़ी तक एक-एक अङ्गकी दिख खोलकर तारीफें करते हैं । जिस तरह रोगी मिटाई खाकर अपने रोगको बढ़ाता है ; उसी तरह जो लोग स्त्री या प्रियाको धारण करते हैं—अपनाते हैं, अनेक तरहके रोगों और दुःखोंको जान-बूझकर आप बुलाते हैं । उनकी हर तरहसे दुर्गति होती है । तरह-तरहके रोग होते हैं, बल घटता है, आयु क्षीण होती है, हर क्षण चिन्तित रहना पड़ता है, शान्ति पास नहीं आती और ईश्वर-भजनमें मन नहीं लगता । हर समय उसीको सन्तुष्ट करनेकी फिक रहती है । मरते समय भी उसीमें मन अटकता रहता है, जीवात्मा उसे छोड़कर जाना नहीं चाहता, उसके संग ही रहना चाहता है, पर समय आ जानेपर कोई भी इस कायामें क्षणभर भी रह नहीं सकता ; अतः देह त्यागनी ही पड़ती है ; पर चूँकि स्त्रीमें मन लगा रह जाता है, उसकी वासना मनमें रह जाती है, इसलिये वासनाके कारण फिर जन्म लेना पड़ता है । जो जन्म लेता है, उसे मरना भी पड़ता है । इस तरह स्त्री-लोलुपको बारम्बार

( २३५ )

अन्म लेने और मरनेका घोर कष्ट सहना होता है । उसे कभी- सुख नहीं मिलता ; उसकी मोक्ष नहीं होती । इसीलिए कहा है कि, जो लोग स्त्रीको रखते हैं, उनको बड़ी बुरी गति होती है ।

सोरठ ।

तजि तरुणी सों नेह, बुद्धिबध्द सों नेह कर । नरक निवारत येह, वहे नरक ले जात है ॥६२॥

62. O wise men, restrain yourselves from the company of women which gives only transitory pleasure, and associate with the virtues of sympathy, benevolence and wisdom. In hell, their fat breasts adorned with necklaces or beautiful waists ornamented with tinkling waist-chains will not help you in any way.

प्राण्णावातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्यवाक्यं

कालेशक्या प्रदानं युवतिजनकथासूक्तभावः परेष्मा ॥

तृष्णाबोतोविभंगो गुरुषु च विनयः सर्वश्रुतासूक्तम्पा

सामान्यःसर्वशास्त्रेष्वनुपहतविधिःश्रेयसामेष पन्थाः ॥६३॥

किसी भी जीवकी हिंसा न करना, पराया माल न लुगाना, सत्य बोलना, समय पर सामर्थ्यानुसार दान करना, परस्त्रियोंकी

तजि=छोड़ो । तरुणी=युवती, जवान औरत । सों=से । नेह=रुनेह, प्रेम । बुद्धिबध्द=बुद्धिरूपी बहू । यहे=बुद्धिरूपी बहू । वहे=तरुणी, वती । नरक निवारत...ले जात है=बुद्धि-बहू नरकसे बचाती है और युवती और नरकमें ले जाती है ।

( २३६ )

चर्चामें जुप रहना, गुरुजनोक सामने नम्र रहना, सब प्राणियोंपर दया करना और भिन्न-भिन्न शास्त्रोंमें समान विश्वास रखना,—ये सब नित्य सुख प्राप्त करनेके अचूक रास्ते हैं ॥३२॥

यदि आप मोक्षकी अचूक राह चाहते हो, यदि आप नित्य सुख-शान्ति चाहते हो, यदि आप चिरस्थायी कल्याण चाहते हो, तो आप किसी भी प्राणीका विनाश मत करो ; अपने पेट के लिये किसी की जान मत मारो । जब मौका आवे, अपनी शक्ति अनुसार गरीबों और मुहताजोंको दान दो, उनके दुःख दूर करो ; उनके दुःखोंको अपना दुःख समझ कर उनका कष्ट निवारण करो । जहाँ पराई स्त्रियोंका जिक्र होता हो, वहाँ मत बैठो ; यदि बडना ही पड़े, तो तुम अपनी ज़बानसे कुछ मत कहो । माता-पिता और गुरुके सामने सदा नम्र रहो, उनकी आज्ञा-पालन करो, उनका मान-सम्मान करो ; भूल कर भी उनका अपमान मत करो । छोटे-बड़े सभी प्राणियों पर दया करो । सभी शास्त्रोंको समान समझो ; किसीमें विश्वास और किसीमें अविश्वास न करो, क्योंकि सभीका ध्येय एक ही है, सभी वहाँ पहुँचते हैं । जिस तरह नदियाँ टेढ़ी-सूधी बहती हुई समुद्रमें ही जा मिलती हैं ; उसी तरह सभी शास्त्र अपनी-अपनी राहोंसे मोक्ष या परमात्मा की ही राह बताते हैं । जो ऐसा विश्वास नहीं रखते, तर्क-चित्तकें भमेलेमें पड़ते हैं, वे वृथा भटकते और अपनी मंजिल मकसूद—परमपद तक—नहीं पहुँचते ।

( २३७ )

महात्मा तुलसीदासजी ने ये सब विषय कैसी खूबीसे संक्षेपमें ही कह दिये हैं—

सदा भजन गुरु साधु द्विज, जीव दया सम जान ।

मुखद सुनै रत सत्यव्रत, स्वर्ग-सस सोपान ॥१॥

बन्धक विधिरत नर धनय, विधि हिंसा अतिलीन ।

तुलसी जग महीं विदित कर, नरक निसैनी तीन ॥२॥

ईश्वर-भजन ; गुरु, साधु-महात्मा और ब्राह्मणोंकी सेवा करना ; जीवोंपर दया करना ; लोकमें समदृष्टि रखना—सबको एक नज़रसे देखना ; सबको सुख देना ; सुनौति पर चलना और सत्यव्रत धारण करना—ये सातों स्वर्गमें जानेकी सात सीढ़ियाँ हैं । जो इन कामोंको वासनाके साथ करते हैं—इन कामोंका पुरस्कार चाहते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और जो इन कामोंको बिना वासनाके करते हैं, वे भगवान्में मिल जाते हैं ।

खुलासा यह है कि, जो लोग परमात्माका भजन करते हैं, गुरु, महात्मा और ब्राह्मणोंकी सेवा करते और उनसे उपदेश लेते हैं, जीवोंपर दया करते हैं, अपनी भरसक किसी भी जीव को दुःख नहीं होने देते, सबको एक नज़रसे देखते हैं, किसीसे दोस्ती और किसीसे दुश्मनी नहीं रखते ; सभीको सुख देते हैं—किसीको भी नहीं सताते ; न्याय और नीतिके मार्ग पर चलते हैं—अनीतिसे बचते और अत्याचार नहीं करते और

( २३८ )

सदा सत्य बोलते हैं—सुपनेमें भी झूठ नहीं बोलते—वे स्वर्गमें जाते हैं, क्योंकि ये सात स्वर्गकी सीढ़ियाँ हैं ।

गोस्वामीजीने ऊपर स्वर्गमें चढ़नेकी सात सीढ़ियाँ बताई हैं, अब वह नरककी तीन नस्लेनी बताते हैं :—जो लोग चोरी, जोरी और ठगी अथवा और तरहसे धोखा देकर पराया धन हड़पते हैं, जो लोग अनीति और अन्याय करते हैं—पराई स्त्रियोंको भोगते हैं, पराई विन्दा या बदनामी करते हैं, पराया काम बिगाड़ते हैं, झूठा खेल्ते हैं, वेश्यागमन या रण्डीबाजी करते हैं, जो लोग अपने सुखके लिए जीवोंको मारते हैं अथवा मोहके बशमें होकर जीवहत्या करते हैं, यानी छल, अनीति और हिंसाका आश्रय लेते हैं, वे निश्चय ही नरकमें जाते हैं ; क्योंकि ये तीनों काम नरककी नस्लेनी हैं ।

63. Refraining from killing all sorts of living beings and from stealing other people's property, speaking the truth, giving alms according to one's means when an occasion for charity arrives, remaining silent in a place where men are talking about other people's wives, demolishing springs of all the desires, behaving humbly before teachers and elders, kindness to all living beings and having equal faith in the teachings of different Shastras are the infallible paths which lead to the acquirement of everlasting bliss.

मातर्लक्ष्मि भजस्व कंचिदपरं मत्काञ्चिणी मा स्म भू- भोगेभ्यः स्पृह्यालवो नहि वयं का निस्पृहाणामसि ॥

( ३३६ )

सयः स्थूतपलाशपत्रपुटिकापात्रे

पवित्रीकृते

भिन्नासक्तुभिरेव सम्पत्तिं क्वं दृत्तिं समीहामहे ॥१४॥

हे मा लक्ष्मी ! अब किसी औरको खोज, मेरी इच्छा न कर ; अब सुमे विषय-भोगोंकी चाहना नहीं है ; मेरे जैसे तिस्रगृह—इच्छा-रहितोंके सामने तू तुच्छ है । क्योंकि अब मैंने हरे ढाकके पत्तोंके दोनोंमें भिक्षाके सत्तूसे गुजारा करनेका संकल्प कर लिया है ॥१४॥

जो अपनी इच्छाका नाश कर देता है, जो किसी भी प्रदार्थकी इच्छा नहीं रखता, वह लक्ष्मी क्या—संसारके बड़े-से-बड़े सुख-भोग और धन-दौलतको तुच्छ समझता है ; वह बादशाहोंको भी माल नहीं समझता । जो जड़लके फलमूलों पर गुजर कर लेता है या भिक्षाके सत्तूको ढाकके पातमें पानीसे घोलकर पी जाता है, वस्त्रको भी जुरत नहीं रखता, उसे किसकी परवा ? उसे दुःख कहाँ ? यदि मनुष्य सच्चा सुख चाहे, परमपद या परमात्माको चाहे तो “इच्छा” को त्याग दे । सब आफतोंकी जड़ “इच्छा” ही है ।

दोहा ।

मोको तजि भजि और को, एरी लक्ष्मी मात ! ।

हैं पलाशके पातमें, मैंग्यो सतुआ खात ॥१४॥

मोको तजि=सुमे छोड़ । भजि औरको=और किसीको पकड़ । एरी

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64. O mother Lkshmi ( Goddess of wealth ) seek some other man and do not desire to make me thy companion. I no longer have a desire for pleasures. What art thou to such desireless persons as I? I have now made up my mind to carry on my living by eating fried grain-flour soaked with water, obtained by begging, out of a receptacle made of a green Palash-tree-leaf.

यूर्य वर्यं वर्यं यूरमित्यासीन्मतिरावयोः ।

किं जातमधुना येन यूर्यं यूर्यं वर्यं वयम् ॥६५॥

पहले हमारा आपका इतना गाढ़ा सम्बन्ध था कि, आप थे सो मैं था, और मैं था सो आप थे। अब क्या फर्क हो गया है, कि मैं—मैं ही हूँ और आप—आप ही हैं ॥६५॥

पहले आपमें और मुझमें भेद नहीं था। जो आप थे सो मैं था और मैं था सो आप थे। मैं और आप दोनों ही एक-से थे—आप और मैं दोनों ही पहले विषयासक्त थे; किन्तु अब बड़ा भेद हो गया है; यानी आप अब तक विषयासक्त ही हैं, पर मैं विषयोंसे विरक्त हो गया हूँ। आपने अब तक संसारके कूठे सुखों—विषयवासनाओंका परित्याग नहीं किया है; पर मित्र, मैं तो अब इनसे दूर हो गया—थक गया; मुझे इनमें कुछ भी सार या तत्त्व न दीखा, इसलिये मैंने अब सबसे किनारा करके वैराग्य ले लिया है। आप अभी

लक्ष्मी मात=ए लक्ष्मी माँ। पलाश=डाक। पात=पत्तों। मारियो=मांगा हुआ। सतुआ=सत्। खात=खाता हूँ।