वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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64. O mother Lkshmi ( Goddess of wealth ) seek some other man and do not desire to make me thy companion. I no longer have a desire for pleasures. What art thou to such desireless persons as I? I have now made up my mind to carry on my living by eating fried grain-flour soaked with water, obtained by begging, out of a receptacle made of a green Palash-tree-leaf.
यूर्य वर्यं वर्यं यूरमित्यासीन्मतिरावयोः ।
किं जातमधुना येन यूर्यं यूर्यं वर्यं वयम् ॥६५॥
पहले हमारा आपका इतना गाढ़ा सम्बन्ध था कि, आप थे सो मैं था, और मैं था सो आप थे। अब क्या फर्क हो गया है, कि मैं—मैं ही हूँ और आप—आप ही हैं ॥६५॥
पहले आपमें और मुझमें भेद नहीं था। जो आप थे सो मैं था और मैं था सो आप थे। मैं और आप दोनों ही एक-से थे—आप और मैं दोनों ही पहले विषयासक्त थे; किन्तु अब बड़ा भेद हो गया है; यानी आप अब तक विषयासक्त ही हैं, पर मैं विषयोंसे विरक्त हो गया हूँ। आपने अब तक संसारके कूठे सुखों—विषयवासनाओंका परित्याग नहीं किया है; पर मित्र, मैं तो अब इनसे दूर हो गया—थक गया; मुझे इनमें कुछ भी सार या तत्त्व न दीखा, इसलिये मैंने अब सबसे किनारा करके वैराग्य ले लिया है। आप अभी
लक्ष्मी मात=ए लक्ष्मी माँ। पलाश=डाक। पात=पत्तों। मारियो=मांगा हुआ। सतुआ=सत्। खात=खाता हूँ।