भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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सयः स्थूतपलाशपत्रपुटिकापात्रे

पवित्रीकृते

भिन्नासक्तुभिरेव सम्पत्तिं क्वं दृत्तिं समीहामहे ॥१४॥

हे मा लक्ष्मी ! अब किसी औरको खोज, मेरी इच्छा न कर ; अब सुमे विषय-भोगोंकी चाहना नहीं है ; मेरे जैसे तिस्रगृह—इच्छा-रहितोंके सामने तू तुच्छ है । क्योंकि अब मैंने हरे ढाकके पत्तोंके दोनोंमें भिक्षाके सत्तूसे गुजारा करनेका संकल्प कर लिया है ॥१४॥

जो अपनी इच्छाका नाश कर देता है, जो किसी भी प्रदार्थकी इच्छा नहीं रखता, वह लक्ष्मी क्या—संसारके बड़े-से-बड़े सुख-भोग और धन-दौलतको तुच्छ समझता है ; वह बादशाहोंको भी माल नहीं समझता । जो जड़लके फलमूलों पर गुजर कर लेता है या भिक्षाके सत्तूको ढाकके पातमें पानीसे घोलकर पी जाता है, वस्त्रको भी जुरत नहीं रखता, उसे किसकी परवा ? उसे दुःख कहाँ ? यदि मनुष्य सच्चा सुख चाहे, परमपद या परमात्माको चाहे तो “इच्छा” को त्याग दे । सब आफतोंकी जड़ “इच्छा” ही है ।

दोहा ।

मोको तजि भजि और को, एरी लक्ष्मी मात ! ।

हैं पलाशके पातमें, मैंग्यो सतुआ खात ॥१४॥

मोको तजि=सुमे छोड़ । भजि औरको=और किसीको पकड़ । एरी