भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २३७ )

महात्मा तुलसीदासजी ने ये सब विषय कैसी खूबीसे संक्षेपमें ही कह दिये हैं—

सदा भजन गुरु साधु द्विज, जीव दया सम जान ।

मुखद सुनै रत सत्यव्रत, स्वर्ग-सस सोपान ॥१॥

बन्धक विधिरत नर धनय, विधि हिंसा अतिलीन ।

तुलसी जग महीं विदित कर, नरक निसैनी तीन ॥२॥

ईश्वर-भजन ; गुरु, साधु-महात्मा और ब्राह्मणोंकी सेवा करना ; जीवोंपर दया करना ; लोकमें समदृष्टि रखना—सबको एक नज़रसे देखना ; सबको सुख देना ; सुनौति पर चलना और सत्यव्रत धारण करना—ये सातों स्वर्गमें जानेकी सात सीढ़ियाँ हैं । जो इन कामोंको वासनाके साथ करते हैं—इन कामोंका पुरस्कार चाहते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और जो इन कामोंको बिना वासनाके करते हैं, वे भगवान्में मिल जाते हैं ।

खुलासा यह है कि, जो लोग परमात्माका भजन करते हैं, गुरु, महात्मा और ब्राह्मणोंकी सेवा करते और उनसे उपदेश लेते हैं, जीवोंपर दया करते हैं, अपनी भरसक किसी भी जीव को दुःख नहीं होने देते, सबको एक नज़रसे देखते हैं, किसीसे दोस्ती और किसीसे दुश्मनी नहीं रखते ; सभीको सुख देते हैं—किसीको भी नहीं सताते ; न्याय और नीतिके मार्ग पर चलते हैं—अनीतिसे बचते और अत्याचार नहीं करते और

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