भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २३६ )

चर्चामें जुप रहना, गुरुजनोक सामने नम्र रहना, सब प्राणियोंपर दया करना और भिन्न-भिन्न शास्त्रोंमें समान विश्वास रखना,—ये सब नित्य सुख प्राप्त करनेके अचूक रास्ते हैं ॥३२॥

यदि आप मोक्षकी अचूक राह चाहते हो, यदि आप नित्य सुख-शान्ति चाहते हो, यदि आप चिरस्थायी कल्याण चाहते हो, तो आप किसी भी प्राणीका विनाश मत करो ; अपने पेट के लिये किसी की जान मत मारो । जब मौका आवे, अपनी शक्ति अनुसार गरीबों और मुहताजोंको दान दो, उनके दुःख दूर करो ; उनके दुःखोंको अपना दुःख समझ कर उनका कष्ट निवारण करो । जहाँ पराई स्त्रियोंका जिक्र होता हो, वहाँ मत बैठो ; यदि बडना ही पड़े, तो तुम अपनी ज़बानसे कुछ मत कहो । माता-पिता और गुरुके सामने सदा नम्र रहो, उनकी आज्ञा-पालन करो, उनका मान-सम्मान करो ; भूल कर भी उनका अपमान मत करो । छोटे-बड़े सभी प्राणियों पर दया करो । सभी शास्त्रोंको समान समझो ; किसीमें विश्वास और किसीमें अविश्वास न करो, क्योंकि सभीका ध्येय एक ही है, सभी वहाँ पहुँचते हैं । जिस तरह नदियाँ टेढ़ी-सूधी बहती हुई समुद्रमें ही जा मिलती हैं ; उसी तरह सभी शास्त्र अपनी-अपनी राहोंसे मोक्ष या परमात्मा की ही राह बताते हैं । जो ऐसा विश्वास नहीं रखते, तर्क-चित्तकें भमेलेमें पड़ते हैं, वे वृथा भटकते और अपनी मंजिल मकसूद—परमपद तक—नहीं पहुँचते ।