वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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से ही जीव संसार-बन्धनमें बँधता है ; यानी वासनासे ही शरीर धारण करता है। वासनासे ही मनुष्य अज्ञानी बन रहा है। वासनाका त्याग करते ही मनुष्य, ज्ञान-लाभ करके, परमानन्द की प्राप्ति करता है। ज्ञानी सच्चिदानन्द रूप ब्रह्मको ज्ञान की आँखोंसे देखता है, पर अज्ञानी उसे नहीं देख सकता। जैसे अन्येको सूर्य नहीं दीखता, उसी तरह अज्ञानीको ब्रह्म नहीं दीखता ; इसीसे अज्ञानीको, बाहरकी आँखें होनेपर भी अन्या कहते हैं। आप भेद-बुद्धिको त्याग कर, सबमें एक आत्माको देखो। आत्मज्ञानी होनेसे ही आपको नित्य सुख मिलेगा।”
पिता-पुत्रके अगाध पाण्डित्य और ज्ञानको देख एकदम चकित हो गया और कहने लगा—“पुत्र ! मैंने चार वेद, छहों शास्त्र, उपनिषद्, स्मृति और पुराण प्रभृति पढ़कर कुछ भी ज्ञान लाभ न किया ; तेरी बातोंसे मेरी आँखें खुल गईं।”
संसारको मिथ्या समझकर ही कोई ज्ञानी कहता है :—
“हे मन ! तू स्त्रीके प्रेममें मत भूल ; यह बिजलीकी चमक, नदीके प्रवाह और नदीकी तरङ्ग प्रभृतिकी तरह चञ्चल है। स्त्रीके प्रेमको कोई ठिकाना नहीं ; आज यह तेरी है, कल पराई है। एक करवट बदलनेमें स्त्री पराई हो जाती है। इसकी कूछी प्रीतिमें कोई लाभ नहीं। गोरुबामी तुलसीदासजी कहते हैं :—