भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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है ; क्योंकि विष स्वभावसे ही प्राणशक्ती होता है । सिर्फ वे लोग इस स्त्री-रूपी विष-बेलसे बचते हैं, जो ज्ञानी हैं, जो इसकी असलियतको जानते हैं, जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें कर लिया है, जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंकी तरफ नहीं झुकतीं । और भी खुलासा यह है, कि स्त्री विष-लताके समान है, विष-लता जिस वृक्षके लिपट जाती है, उसे सुखा-सुखाकर नष्ट कर देती है । इसी तरह स्त्री जिस विषयी पुरुषके पीछे लग जाती है अथवा जो पुरुष स्त्रीके फन्देमें फँस जाता है, वह भी सब तरहसे नष्ट हो जाता है । इसके सभी अंगोंमें विष भरा है । जिस तरह विष खानेसे जहर बढ़ता है ; उसी तरह इसकी आँख, इसके गाल, इसकी भौं, इसकी छातियाँ और जाँघें प्रभृति किसी भी अंगके देखने और छूनेसे विष बढ़ जाता है । विषके बढ़ जानेसे पुरुष मतवाला हो जाता है ; उसके होश-हवास क्षता हो जाते और बुद्धि मारी जाती है । बुद्धिके मारे जानेसे पुरुष बिना पत-वारकी नावकी तरह नष्ट हो जाता है । इस लोकमें नाना प्रकारके रोग और दुःख भोगकर मर जाता और परलोकमें भी दुःख ही पाता है । संखिया प्रभृति विषोंका मारा हुआ इसी लोकमें दुःख पाता है । पर इस स्त्री-विषका मारा हुआ अनेक जन्मोंमें दुःख पाता है । और जहर खानेवाला एक ही बार मरता है ; पर स्त्री-विष सेवन करने वाला बारम्बार मरता है । अतः बुद्धिमानोंको इस स्त्री-रूपी विषलतासे सदा दूर रहना चाहिये, ताकि इसका विष शरीरमें पेवस्त न होने पावे ।