भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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स्त्रीका शरीर अत्यन्त मैला और अतीव अशुद्ध या गन्दा है। इसका प्रत्येक रोम मैला और सारे ही दरवाजे गन्दे हैं। इसका शरीर हाड़, मांस, मज्जा, मेद और चमड़ेसे लिपटा हुआ है। इसके अन्दर जगह-जगह खूनके होड़ भरे हुए हैं। पेशाब और पाखाने की आँति आपसमें सट रही हैं। इन सबके अलावा, पेटमें और भी अनेक तरहके मैले भरे हुए हैं। सुन्दरदास जी कहते हैं, नारी एड़ीसे चौटी तक निन्द्य है—नखसे शिख तक निन्दा करने योग्य है। ऐसी निन्दाकी पात्री नारीकी जो सराहना करते हैं, वे तो निश्चय ही बड़े गवार और भौढ़ हैं।

खुलासा यह है कि, स्त्री ऊपरसे अच्छी मालूम होती है, पर वास्तवमें गन्दगीका पिटारा है। इसकी नाकमें रहूँट भरा हुआ है। इसकी आँखोंमें गीड़े भरी हुई हैं। इसके मुँहमें कफ और खवार भरे हुए हैं। इसकी मूत्रेन्द्रियसे हर समय सफेद-सफेद या लाल-लाल गन्दा पदार्थ बहा करता है। पेशाबसे जाँवे भीगी रहती हैं। इसकी मल और मूत्र त्यागने की इन्द्रियोंमें दो अंगुलसे त्रिषादा दूर का फर्क नहीं है। जिन छातियोंपर विषयी मरे मिटते हैं, जिन्हें वे सुन्दर सोनेके कलशे, कामदेवके नगाड़े अथवा शन्तरे और अनार कहते हैं, वे दो मांसके लौदे हैं। उनके ऊपर चमड़ा चढ़ा हुआ है, इसीसे उनके भीतरकी गन्दगी छिपी रहती है। ऐसी गन्दगीकी पिटारीकी