वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २३४ )
तारीकोंमें जो लोग कविताएँ करते हैं, वे समझच ही बेअकल और गँवार हैं ।
( ३ )
अनेक तरहकी इन्द्रिय-भोग-सम्बन्धी वस्तुओंसे बनी हुई और सजी हुई स्त्री विषयी लोगोंको बहुत ही प्यारी लगती है । जब बलवान काम जागता है, तब वे इसका नखशिश वर्णन करनेमें अपनी सारी विद्वत्ता खर्च कर देते हैं । चोटोंसे पड़ी तक एक-एक अङ्गकी दिख खोलकर तारीफें करते हैं । जिस तरह रोगी मिटाई खाकर अपने रोगको बढ़ाता है ; उसी तरह जो लोग स्त्री या प्रियाको धारण करते हैं—अपनाते हैं, अनेक तरहके रोगों और दुःखोंको जान-बूझकर आप बुलाते हैं । उनकी हर तरहसे दुर्गति होती है । तरह-तरहके रोग होते हैं, बल घटता है, आयु क्षीण होती है, हर क्षण चिन्तित रहना पड़ता है, शान्ति पास नहीं आती और ईश्वर-भजनमें मन नहीं लगता । हर समय उसीको सन्तुष्ट करनेकी फिक रहती है । मरते समय भी उसीमें मन अटकता रहता है, जीवात्मा उसे छोड़कर जाना नहीं चाहता, उसके संग ही रहना चाहता है, पर समय आ जानेपर कोई भी इस कायामें क्षणभर भी रह नहीं सकता ; अतः देह त्यागनी ही पड़ती है ; पर चूँकि स्त्रीमें मन लगा रह जाता है, उसकी वासना मनमें रह जाती है, इसलिये वासनाके कारण फिर जन्म लेना पड़ता है । जो जन्म लेता है, उसे मरना भी पड़ता है । इस तरह स्त्री-लोलुपको बारम्बार