वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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है। जो लोग ऐसा समझते हैं; वह बड़ी भूल करते हैं। पुत्रों से किसी की भी गति न तो हुई है और न होगी; सब की गति अपने ही पुरुषार्थ से होती है। अगर पुत्रों से स्वर्ग या मोक्षकी प्राप्ति होती, तो कोई विरला ही नरकमें जाता। जो जैसा करता है, उसे वैसा ही फल भोगना होता है। ब्रह्महत्या, स्त्रीहत्या, भ्रूणहत्या, परस्त्रीगमन और परधन-हरण प्रभृति पापोंका फल कर्ताको भोगना ही होता है। जो ऐसा समझते हैं कि, ऐसे पाप करने पर भी पुत्र-पौत्रोंके होनेसे, हम दण्ड से बच जायेंगे, वे बड़े ही मूर्ख हैं। ज्ञानी लोग तो संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये अपने पुत्रों का भी त्याग कर देते हैं।
एक ब्राह्मण और उसका अन्धा पुत्र।
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किसी नगर में एक ब्राह्मण रहता था। उसके पुत्र नहीं हुआ था, इसलिये उसने गंगाजीकी उपासना की। अन्त में, बूढ़ी अवस्था में, उसके एक अन्धा पुत्र हुआ। ब्राह्मण उस अन्धे पुत्र को पाकर ही बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने खूब उत्सव और भोज प्रभृति किये। इसके बाद जब वह अन्धा पुत्र पाँच बरस का हुआ, ब्राह्मणने उसका यज्ञोपवीत-संस्कार कराकर, उसे विद्या पढ़ाना आरम्भ किया। चन्द्रोज में वह अन्धा पूर्ण पण्डित हो गया।
एक दिन पिता-पुत्र बैठे थे। पुत्र ने पिता से पूछा—