वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( २३१ )
( ३ )
रसिकप्रिया रसमंजरी, और शृंगारहि जान । चतुराई करि बहुत विधि, विषय बनाई आन ॥ विषय बनाई आन, लगत विषयिनकँ प्यारी । जागे मदन प्रचण्ड, सराहै नखशिख नारी ॥ ज्यों रोगी मिष्टाव खाइ, रोगहि विस्तारै । “सुन्दर” ये गति होइ, जोइ रसिकप्रिया धारै ॥
विषकी ज़मीनमें विषके अङ्कुर जमे । फिर नारी रूपी विष- लता बढ़ी । उस लतामें विषकी जड़ें लगीं और विषका डालियाँ और पत्तियाँ आईं । फिर उस लतामें विषके ही फल और फूल लगे । उस विषलतामेंसे विषके तन्तु निकले । फिर उस लताने अपने विष-तन्तु फैला फैलाकर नर-वृक्षोंको इलझा लिया और खुद उनके लिपट गई । सुन्दरदासजी कहते हैं, उस विषलताके फन्देमें अधिकांश नररूपी वृक्ष फँस गये—कोई विरले ही सन्तरूपी वृक्ष उससे अछूते बच सके । उनके ही शरीरोंमें यह विष लता लगी हुई न दिखाई दी ।
मतलब यह है, कि खी विषकी बेल है । उसकी जड़, उसकी डालियाँ, उसकी पत्तियाँ और उसके फल-फूल सभी विषपूर्ण हैं । सारांश यह कि, खीका सम्बन्ध विषसे भरा है । खीका कोई भी अंग ऐसा नहीं जिसमें विष न हो । यह खी रूपी विषबेल अज्ञानी विषयी लोगोंको अपने फन्देमें फँसाकर नाश कर देती
( २३२ )
है ; क्योंकि विष स्वभावसे ही प्राणशक्ती होता है । सिर्फ वे लोग इस स्त्री-रूपी विष-बेलसे बचते हैं, जो ज्ञानी हैं, जो इसकी असलियतको जानते हैं, जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें कर लिया है, जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंकी तरफ नहीं झुकतीं । और भी खुलासा यह है, कि स्त्री विष-लताके समान है, विष-लता जिस वृक्षके लिपट जाती है, उसे सुखा-सुखाकर नष्ट कर देती है । इसी तरह स्त्री जिस विषयी पुरुषके पीछे लग जाती है अथवा जो पुरुष स्त्रीके फन्देमें फँस जाता है, वह भी सब तरहसे नष्ट हो जाता है । इसके सभी अंगोंमें विष भरा है । जिस तरह विष खानेसे जहर बढ़ता है ; उसी तरह इसकी आँख, इसके गाल, इसकी भौं, इसकी छातियाँ और जाँघें प्रभृति किसी भी अंगके देखने और छूनेसे विष बढ़ जाता है । विषके बढ़ जानेसे पुरुष मतवाला हो जाता है ; उसके होश-हवास क्षता हो जाते और बुद्धि मारी जाती है । बुद्धिके मारे जानेसे पुरुष बिना पत-वारकी नावकी तरह नष्ट हो जाता है । इस लोकमें नाना प्रकारके रोग और दुःख भोगकर मर जाता और परलोकमें भी दुःख ही पाता है । संखिया प्रभृति विषोंका मारा हुआ इसी लोकमें दुःख पाता है । पर इस स्त्री-विषका मारा हुआ अनेक जन्मोंमें दुःख पाता है । और जहर खानेवाला एक ही बार मरता है ; पर स्त्री-विष सेवन करने वाला बारम्बार मरता है । अतः बुद्धिमानोंको इस स्त्री-रूपी विषलतासे सदा दूर रहना चाहिये, ताकि इसका विष शरीरमें पेवस्त न होने पावे ।
( २३३ )
( २ )
स्त्रीका शरीर अत्यन्त मैला और अतीव अशुद्ध या गन्दा है। इसका प्रत्येक रोम मैला और सारे ही दरवाजे गन्दे हैं। इसका शरीर हाड़, मांस, मज्जा, मेद और चमड़ेसे लिपटा हुआ है। इसके अन्दर जगह-जगह खूनके होड़ भरे हुए हैं। पेशाब और पाखाने की आँति आपसमें सट रही हैं। इन सबके अलावा, पेटमें और भी अनेक तरहके मैले भरे हुए हैं। सुन्दरदास जी कहते हैं, नारी एड़ीसे चौटी तक निन्द्य है—नखसे शिख तक निन्दा करने योग्य है। ऐसी निन्दाकी पात्री नारीकी जो सराहना करते हैं, वे तो निश्चय ही बड़े गवार और भौढ़ हैं।
खुलासा यह है कि, स्त्री ऊपरसे अच्छी मालूम होती है, पर वास्तवमें गन्दगीका पिटारा है। इसकी नाकमें रहूँट भरा हुआ है। इसकी आँखोंमें गीड़े भरी हुई हैं। इसके मुँहमें कफ और खवार भरे हुए हैं। इसकी मूत्रेन्द्रियसे हर समय सफेद-सफेद या लाल-लाल गन्दा पदार्थ बहा करता है। पेशाबसे जाँवे भीगी रहती हैं। इसकी मल और मूत्र त्यागने की इन्द्रियोंमें दो अंगुलसे त्रिषादा दूर का फर्क नहीं है। जिन छातियोंपर विषयी मरे मिटते हैं, जिन्हें वे सुन्दर सोनेके कलशे, कामदेवके नगाड़े अथवा शन्तरे और अनार कहते हैं, वे दो मांसके लौदे हैं। उनके ऊपर चमड़ा चढ़ा हुआ है, इसीसे उनके भीतरकी गन्दगी छिपी रहती है। ऐसी गन्दगीकी पिटारीकी
( २३४ )
तारीकोंमें जो लोग कविताएँ करते हैं, वे समझच ही बेअकल और गँवार हैं ।
( ३ )
अनेक तरहकी इन्द्रिय-भोग-सम्बन्धी वस्तुओंसे बनी हुई और सजी हुई स्त्री विषयी लोगोंको बहुत ही प्यारी लगती है । जब बलवान काम जागता है, तब वे इसका नखशिश वर्णन करनेमें अपनी सारी विद्वत्ता खर्च कर देते हैं । चोटोंसे पड़ी तक एक-एक अङ्गकी दिख खोलकर तारीफें करते हैं । जिस तरह रोगी मिटाई खाकर अपने रोगको बढ़ाता है ; उसी तरह जो लोग स्त्री या प्रियाको धारण करते हैं—अपनाते हैं, अनेक तरहके रोगों और दुःखोंको जान-बूझकर आप बुलाते हैं । उनकी हर तरहसे दुर्गति होती है । तरह-तरहके रोग होते हैं, बल घटता है, आयु क्षीण होती है, हर क्षण चिन्तित रहना पड़ता है, शान्ति पास नहीं आती और ईश्वर-भजनमें मन नहीं लगता । हर समय उसीको सन्तुष्ट करनेकी फिक रहती है । मरते समय भी उसीमें मन अटकता रहता है, जीवात्मा उसे छोड़कर जाना नहीं चाहता, उसके संग ही रहना चाहता है, पर समय आ जानेपर कोई भी इस कायामें क्षणभर भी रह नहीं सकता ; अतः देह त्यागनी ही पड़ती है ; पर चूँकि स्त्रीमें मन लगा रह जाता है, उसकी वासना मनमें रह जाती है, इसलिये वासनाके कारण फिर जन्म लेना पड़ता है । जो जन्म लेता है, उसे मरना भी पड़ता है । इस तरह स्त्री-लोलुपको बारम्बार
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अन्म लेने और मरनेका घोर कष्ट सहना होता है । उसे कभी- सुख नहीं मिलता ; उसकी मोक्ष नहीं होती । इसीलिए कहा है कि, जो लोग स्त्रीको रखते हैं, उनको बड़ी बुरी गति होती है ।
सोरठ ।
तजि तरुणी सों नेह, बुद्धिबध्द सों नेह कर । नरक निवारत येह, वहे नरक ले जात है ॥६२॥
62. O wise men, restrain yourselves from the company of women which gives only transitory pleasure, and associate with the virtues of sympathy, benevolence and wisdom. In hell, their fat breasts adorned with necklaces or beautiful waists ornamented with tinkling waist-chains will not help you in any way.
प्राण्णावातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्यवाक्यं
कालेशक्या प्रदानं युवतिजनकथासूक्तभावः परेष्मा ॥
तृष्णाबोतोविभंगो गुरुषु च विनयः सर्वश्रुतासूक्तम्पा
सामान्यःसर्वशास्त्रेष्वनुपहतविधिःश्रेयसामेष पन्थाः ॥६३॥
किसी भी जीवकी हिंसा न करना, पराया माल न लुगाना, सत्य बोलना, समय पर सामर्थ्यानुसार दान करना, परस्त्रियोंकी
तजि=छोड़ो । तरुणी=युवती, जवान औरत । सों=से । नेह=रुनेह, प्रेम । बुद्धिबध्द=बुद्धिरूपी बहू । यहे=बुद्धिरूपी बहू । वहे=तरुणी, वती । नरक निवारत...ले जात है=बुद्धि-बहू नरकसे बचाती है और युवती और नरकमें ले जाती है ।
( २३६ )
चर्चामें जुप रहना, गुरुजनोक सामने नम्र रहना, सब प्राणियोंपर दया करना और भिन्न-भिन्न शास्त्रोंमें समान विश्वास रखना,—ये सब नित्य सुख प्राप्त करनेके अचूक रास्ते हैं ॥३२॥
यदि आप मोक्षकी अचूक राह चाहते हो, यदि आप नित्य सुख-शान्ति चाहते हो, यदि आप चिरस्थायी कल्याण चाहते हो, तो आप किसी भी प्राणीका विनाश मत करो ; अपने पेट के लिये किसी की जान मत मारो । जब मौका आवे, अपनी शक्ति अनुसार गरीबों और मुहताजोंको दान दो, उनके दुःख दूर करो ; उनके दुःखोंको अपना दुःख समझ कर उनका कष्ट निवारण करो । जहाँ पराई स्त्रियोंका जिक्र होता हो, वहाँ मत बैठो ; यदि बडना ही पड़े, तो तुम अपनी ज़बानसे कुछ मत कहो । माता-पिता और गुरुके सामने सदा नम्र रहो, उनकी आज्ञा-पालन करो, उनका मान-सम्मान करो ; भूल कर भी उनका अपमान मत करो । छोटे-बड़े सभी प्राणियों पर दया करो । सभी शास्त्रोंको समान समझो ; किसीमें विश्वास और किसीमें अविश्वास न करो, क्योंकि सभीका ध्येय एक ही है, सभी वहाँ पहुँचते हैं । जिस तरह नदियाँ टेढ़ी-सूधी बहती हुई समुद्रमें ही जा मिलती हैं ; उसी तरह सभी शास्त्र अपनी-अपनी राहोंसे मोक्ष या परमात्मा की ही राह बताते हैं । जो ऐसा विश्वास नहीं रखते, तर्क-चित्तकें भमेलेमें पड़ते हैं, वे वृथा भटकते और अपनी मंजिल मकसूद—परमपद तक—नहीं पहुँचते ।
( २३७ )
महात्मा तुलसीदासजी ने ये सब विषय कैसी खूबीसे संक्षेपमें ही कह दिये हैं—
सदा भजन गुरु साधु द्विज, जीव दया सम जान ।
मुखद सुनै रत सत्यव्रत, स्वर्ग-सस सोपान ॥१॥
बन्धक विधिरत नर धनय, विधि हिंसा अतिलीन ।
तुलसी जग महीं विदित कर, नरक निसैनी तीन ॥२॥
ईश्वर-भजन ; गुरु, साधु-महात्मा और ब्राह्मणोंकी सेवा करना ; जीवोंपर दया करना ; लोकमें समदृष्टि रखना—सबको एक नज़रसे देखना ; सबको सुख देना ; सुनौति पर चलना और सत्यव्रत धारण करना—ये सातों स्वर्गमें जानेकी सात सीढ़ियाँ हैं । जो इन कामोंको वासनाके साथ करते हैं—इन कामोंका पुरस्कार चाहते हैं, वे स्वर्गमें जाते हैं और जो इन कामोंको बिना वासनाके करते हैं, वे भगवान्में मिल जाते हैं ।
खुलासा यह है कि, जो लोग परमात्माका भजन करते हैं, गुरु, महात्मा और ब्राह्मणोंकी सेवा करते और उनसे उपदेश लेते हैं, जीवोंपर दया करते हैं, अपनी भरसक किसी भी जीव को दुःख नहीं होने देते, सबको एक नज़रसे देखते हैं, किसीसे दोस्ती और किसीसे दुश्मनी नहीं रखते ; सभीको सुख देते हैं—किसीको भी नहीं सताते ; न्याय और नीतिके मार्ग पर चलते हैं—अनीतिसे बचते और अत्याचार नहीं करते और
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सदा सत्य बोलते हैं—सुपनेमें भी झूठ नहीं बोलते—वे स्वर्गमें जाते हैं, क्योंकि ये सात स्वर्गकी सीढ़ियाँ हैं ।
गोस्वामीजीने ऊपर स्वर्गमें चढ़नेकी सात सीढ़ियाँ बताई हैं, अब वह नरककी तीन नस्लेनी बताते हैं :—जो लोग चोरी, जोरी और ठगी अथवा और तरहसे धोखा देकर पराया धन हड़पते हैं, जो लोग अनीति और अन्याय करते हैं—पराई स्त्रियोंको भोगते हैं, पराई विन्दा या बदनामी करते हैं, पराया काम बिगाड़ते हैं, झूठा खेल्ते हैं, वेश्यागमन या रण्डीबाजी करते हैं, जो लोग अपने सुखके लिए जीवोंको मारते हैं अथवा मोहके बशमें होकर जीवहत्या करते हैं, यानी छल, अनीति और हिंसाका आश्रय लेते हैं, वे निश्चय ही नरकमें जाते हैं ; क्योंकि ये तीनों काम नरककी नस्लेनी हैं ।
63. Refraining from killing all sorts of living beings and from stealing other people's property, speaking the truth, giving alms according to one's means when an occasion for charity arrives, remaining silent in a place where men are talking about other people's wives, demolishing springs of all the desires, behaving humbly before teachers and elders, kindness to all living beings and having equal faith in the teachings of different Shastras are the infallible paths which lead to the acquirement of everlasting bliss.
मातर्लक्ष्मि भजस्व कंचिदपरं मत्काञ्चिणी मा स्म भू- भोगेभ्यः स्पृह्यालवो नहि वयं का निस्पृहाणामसि ॥
( ३३६ )
सयः स्थूतपलाशपत्रपुटिकापात्रे
पवित्रीकृते
भिन्नासक्तुभिरेव सम्पत्तिं क्वं दृत्तिं समीहामहे ॥१४॥
हे मा लक्ष्मी ! अब किसी औरको खोज, मेरी इच्छा न कर ; अब सुमे विषय-भोगोंकी चाहना नहीं है ; मेरे जैसे तिस्रगृह—इच्छा-रहितोंके सामने तू तुच्छ है । क्योंकि अब मैंने हरे ढाकके पत्तोंके दोनोंमें भिक्षाके सत्तूसे गुजारा करनेका संकल्प कर लिया है ॥१४॥
जो अपनी इच्छाका नाश कर देता है, जो किसी भी प्रदार्थकी इच्छा नहीं रखता, वह लक्ष्मी क्या—संसारके बड़े-से-बड़े सुख-भोग और धन-दौलतको तुच्छ समझता है ; वह बादशाहोंको भी माल नहीं समझता । जो जड़लके फलमूलों पर गुजर कर लेता है या भिक्षाके सत्तूको ढाकके पातमें पानीसे घोलकर पी जाता है, वस्त्रको भी जुरत नहीं रखता, उसे किसकी परवा ? उसे दुःख कहाँ ? यदि मनुष्य सच्चा सुख चाहे, परमपद या परमात्माको चाहे तो “इच्छा” को त्याग दे । सब आफतोंकी जड़ “इच्छा” ही है ।
दोहा ।
मोको तजि भजि और को, एरी लक्ष्मी मात ! ।
हैं पलाशके पातमें, मैंग्यो सतुआ खात ॥१४॥
मोको तजि=सुमे छोड़ । भजि औरको=और किसीको पकड़ । एरी
( २४० )
64. O mother Lkshmi ( Goddess of wealth ) seek some other man and do not desire to make me thy companion. I no longer have a desire for pleasures. What art thou to such desireless persons as I? I have now made up my mind to carry on my living by eating fried grain-flour soaked with water, obtained by begging, out of a receptacle made of a green Palash-tree-leaf.
यूर्य वर्यं वर्यं यूरमित्यासीन्मतिरावयोः ।
किं जातमधुना येन यूर्यं यूर्यं वर्यं वयम् ॥६५॥
पहले हमारा आपका इतना गाढ़ा सम्बन्ध था कि, आप थे सो मैं था, और मैं था सो आप थे। अब क्या फर्क हो गया है, कि मैं—मैं ही हूँ और आप—आप ही हैं ॥६५॥
पहले आपमें और मुझमें भेद नहीं था। जो आप थे सो मैं था और मैं था सो आप थे। मैं और आप दोनों ही एक-से थे—आप और मैं दोनों ही पहले विषयासक्त थे; किन्तु अब बड़ा भेद हो गया है; यानी आप अब तक विषयासक्त ही हैं, पर मैं विषयोंसे विरक्त हो गया हूँ। आपने अब तक संसारके कूठे सुखों—विषयवासनाओंका परित्याग नहीं किया है; पर मित्र, मैं तो अब इनसे दूर हो गया—थक गया; मुझे इनमें कुछ भी सार या तत्त्व न दीखा, इसलिये मैंने अब सबसे किनारा करके वैराग्य ले लिया है। आप अभी
लक्ष्मी मात=ए लक्ष्मी माँ। पलाश=डाक। पात=पत्तों। मारियो=मांगा हुआ। सतुआ=सत्। खात=खाता हूँ।
A high-contrast, black and white photograph of a blank page, possibly a book cover or endpaper, held by a hand. The page is mostly white with some minor scanning artifacts. The right edge shows the dark background and the fingers of a hand holding the page.
वैराग्यशतक ७७६
हे खी ! अब तू अपनी कामसद पैदा करने वाली दुष्टि को रोक ले, हम पर कटाक्षवाक्ष न जला । तेरा परिश्रम व्यर्थ आयगा । क्योंकि अब हमने विषयों को तुष्टवत् त्याग दिया है ।
( २४१ )
तक नरकमें ही हैं; पर मैं विवेक-बुद्धिसे काम लेकर, नरकसे निकलकर स्वर्गमें आ गया हूँ। आप अभी तक दुःखके बीज ही बो रहे हैं; पर मैं अब सुखके बीज बो रहा हूँ। मित्र! तुम भी मेरी तरह उन भयङ्कर जञ्जालोंको छोड़ कर, मेरी जैसी सुखको राह पर क्यों नहीं आ जाते? मित्रवर ! इसी राहमें सुख है; उस राहमें घोर दुःख और नरकयातनायें हैं। संसारको छोड़ने और भगवत् से-प्राप्ति करनेमें बड़ा आनन्द है। उस्ताद् जौकने कहा है:—
दुनियासे जौक, रिश्तये उल्फतको तोड़ दे ।
जिस सरका है यह बाल, उसी सरमें जोड़ दे ॥
दोहा ।
तुम-हम हम-तुम एक हैं, सब विधि रखो अमेद ।
अब तुम-तुम हम-हमहि हैं, भयो कठिन यह मेद ॥
65. I had such a staunch connection with you before that it seemed as if you were I and I was you. What has happened now that you have become yourself and I myself again?
बाले लीलामुकुलितममीन्धरा दधिप्राता:
किं चिप्प्यते विरमं विरमं व्यर्थ एव अमस्ते ॥
संपत्यन्ये वयमुपरतं बाल्यमाप्नोत् वनान्ते
जीणो मोहस्तृणमिव जगन्जालमालोकयामः ॥ ६६ ॥
२६
( २४२ )
ऐ वाला ! अब तू लीलासे अपनी आधी खुली आँखोंसे मुझ पर क्यों कटाक्ष-वाण चलाती है ? अब तू काममद पैदा करने वाली दृष्टि को रोक ले ; तेरे इस परिश्रम से तुझे कोई लाभ न होगा । अब हम पहले जैसे नहीं रहे हैं । हमारी जवानी चली गई है । अब हमने वनमें रहनेका निश्चय कर लिया है और मेहत्याग दिया है ; अब हम विषय-सुखों को तृण से भी निकम्मा समझते हैं ॥३॥
महाकवि दाग कहते हैं :—
तोवा जो मैंनेकी, निकल आया ज़रासा मुँह ।
वह रंग रूप ही नहीं, सुबहे बहारका ॥
बसन्त को अपने सौन्दर्यका बड़ा अभिमान था । जबसे मैंने शराब पीनेसे तोबा कर ली है, तबसे बसन्त-लक्ष्मीका मुँह फोका पड़ गया है । जब तक मैं शराबी था, तभी तक उसकी शोभाका कायल था । अब तो मुझे उसमें कुछ भी विशेषता मालूम नहीं होती ।
66. O young lady, why art thou playfully peeping at us out of half-closed eyes ? Stop thy love-inspiring glances as all thy labour will be fruitless. Now we are different from what we were before. Our youth has gone. We are now bent on living in the forest. Our attachments have been given up and we look at the enjoyments of the world like a worthless straw.
( २४३ )
इयं बाला मां प्रत्यनवरतभिन्दीवरदल प्रभाचोरं चक्षुः क्षिपति किमभिप्रेतमनया ॥
गतो मोहोऽस्माकं स्मरकुसुमवाण्यव्यतिकर-
ज्वलज्ज्वाला शान्ता तदपि न वराकी विरमति ॥६७॥
यह बाला ल्नी सुम्र पर बार-बार नील कमलकी शोभासे भी सुन्दर नेत्रोंके कटाक्ष क्यों मारती है ? मैं नहीं समझता, इसका क्या मतलब है ? अब तो मेरा मोह जाता रहा है—कामके पुष्प-वाणोंसे निकली हुई आगकी ज्वाला शान्त हो गई है। आश्चर्य है, कि अब तक भी यह मूर्खा बाला अपनी कोशिशोंसे बाजू नहीं ब्राती ! ॥६७॥
जिनका मोह-जाल कट जाता है, जिनकी विषयवासना बुझ जाती है, जो स्त्रियोंकी असलियत को समझ जाते हैं, जो उनको नरककी नसेनी समझ लेते हैं, उनपर स्त्रियोंके कटाक्ष-वाण असर नहीं करते। हाँ, वे अपने स्वभावानुसार अपने तीखे-तीखे वाण चलाया ही करती हैं—अपने जाल बिछाया ही करती हैं ; पर तत्त्ववित् लोग उनके जालमें नहीं फँसते। उन पर उनके अचूक वाण फँल हो जाते हैं।
दोहा ।
केहि कारण डारत वयन, कमलनयन यह नार ।
मोह काम मेरे नहीं, तज न तिय-चित् हार ॥६७॥
( २४४ )
67. Why does this young woman continuously throw at me glances out of eyes which are beautiful like a lotus-leaf ? I wonder what is her object in doing so ! My passions have now gone and the fire lit up within my heart by concussion produced by the striking of cupid's arrows of flowers has been extinguished. It is strange that the foolish damsel does not quit her efforts even now !
रम्यं हर्म्यतलं न किं बसतये श्राव्यं न गेयादिकं किं वा प्राणसमासमागमसुखं नैवाधिकं पीतये ॥ किं तूद्धान्तपतयंतगपवनन्यालोलीदीपांकुर- च्छायाचंचलमाकलव्य सकलं सतो बनांतं गताः ॥६८॥
क्या सन्तोके रहनेके लिये उत्तमोत्तम महल न थे, क्या सुनने के लिये उत्तमोत्तम गान न थे, क्या प्यारी-प्यारी स्त्रियोंके संगम का सुख न था, जो वे लोग बनोमें रहनेको गये ? हाँ, सब कुछ था ; पर उन्होंने इस जगत्को गिरने वाले पतंगके पछोसे उत्पन्न हवासे हिलते हुए दीपक की छायाके समान चञ्चल समझकर छोड़ दिया ; अथवा उन्होंने मूर्ख पतंगकी भाँति, जो हवासे हिलते हुए दीपक की छायामें घूम-घूमकर अपने तर्जि जलाकर भस्म कर देता है, संसारको अपना नाश कराते देखकर संसारको छोड़ दिया ॥६८॥
यह संसार दीपक की लोहे के समान है और इसमें बसने वाले जीव पतङ्गोंके समान हैं। जिस तरह मूर्ख पतङ्ग दीपक
वैराग्यशतक २
पञ्जाबी भगवत् प्रसंग और महालियों की समग्र संख्या का भाषा तोड़ में देख कर पाठना जाय करने हैं :
A high-contrast, black-and-white photograph. In the lower-left corner, two fingers are visible, holding the left edge of a large, mostly white rectangular area. The fingers are dark, and the skin texture is somewhat visible. The white area has a few small, dark specks or blemishes. At the very bottom of the frame, there is a solid, dark horizontal band that spans the width of the image. The overall composition is minimalist and focuses on the interaction between the hand and the page.
( २४५ )
से मोह करके और उस पर गिर-गिर भस्म होते हैं ; उसी तरह मनुष्य इस संसारके असल तत्त्वको न समझकर, इसके मोहमें फँस कर, इसमें नाश होते हैं । जिस तरह पतङ्ग नहीं समझता, कि दीपकसे प्रेम करनेमें मेरे हाथ कुछ न आवेगा, बल्कि मेरी जान ही जायगी ; उसी तरह संसारी आदमी नहीं समझते, कि इन संसारी विषय-वासनाओंमें फँस कर, इनसे प्रेम करके हम अपना नाश करा बैठेंगे । जो बुद्धिमान और विचारवान् है, वे इस बातको समझते हैं ; अतः संसारी पदार्थाँसे मोह नहीं करते और अपने नाशसे बचते हैं । वे संसारको अनित्य और नाशकी निशानी समझ कर, इससे मन हटाकर परमात्मामें मन लगाते हैं । वे अपने तर्जुनियार्थाका मुसाफिर मात्र समझ कर, मौतका हरदम खयाल रखते हैं । महात्मा कबीरने कहा है—
तन सराय मन पाहरु, मनसा उत्तरी आय । को काहू को है नहीं, सब देखा ठोक बजाय ॥ “कबिरा” रसरी पाँव में, कहैं सोचे सुख चैन । शवास-नकारा कूँच का, बाजत है दिन रैन ॥ इस चौसर चेता नहीं, पशु-ज्यों पाली देह । राम नाम जाना नहीं, अन्त परी सुख लेह ॥
यह शरीर सराय है, मन चौकीदार है और मनसा—इच्छा इस शरीर कपी सरायमें उत्तरा हुआ मुसाफिर है ; इस जगत्में
i t h e is
नी यें ता ने
को हल
( २४६ )
कोई किसीका नहीं है। अच्छी तरह ठोक बजा या जाँच पड़-ताल कर देख लिया।
हे कबीर ! पैरोंमें रस्सी पड़ी हुई है। फिर भी तू सुख-चैनमें कैसे सो रहा है? देख, इस दुनियासे कूच करनेका आस-रूपी नगाड़ा दिन-रात बज रहा है !
अगर तू इस चौपड़के खेलमें न चेतोगा, इस जन्ममें भी होश न करेगा, पशुकी तरह शरीरको पाछेगा और रामको नहीं जानेगा ; तो अन्तमें तेरे मुँहमें धूल पड़ेगी।
छपय ।
महल महारमणीक, कहा बसिने नहीं लायक ?
नाहिन सुनवे जोग, कहा जो गावत गायक ?
नवतरुणी के संग, कहा सुखहूँ नहीं लागत ?
तो काहे को छँड़-छँड़, ये बन को भागत ?
इन जान लियो या जगतको, जैसे दीपक पवनमें ।
बुझिजात छिनकमें छवि भर्यो, होत अँधेरो भवनमें ॥६८॥
अतीव सुन्दर और रमणीक महल क्या बसने योग्य नहीं हैं ? गवैये जो मनोहर गाना गाते हैं, क्या वह छनने योग्य नहीं है ? नवीना बाला स्त्रियों के साथ रम्या करनेमें क्या आनन्द नहीं आता ? अगर इन सबमें आनन्द और सुख है, तो फिर लोग इन सबको छोड़-छोड़ कर बनमें क्यों भागे जाते हैं ? इसलिये भागे जाते हैं, कि उन्होंने इस जगत्को उस दीपकके समान समझ लिया है, जो हवामें रखा हुआ है और ज्वा-भरमें उफ-जाता है।