वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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67. Why does this young woman continuously throw at me glances out of eyes which are beautiful like a lotus-leaf ? I wonder what is her object in doing so ! My passions have now gone and the fire lit up within my heart by concussion produced by the striking of cupid's arrows of flowers has been extinguished. It is strange that the foolish damsel does not quit her efforts even now !
रम्यं हर्म्यतलं न किं बसतये श्राव्यं न गेयादिकं किं वा प्राणसमासमागमसुखं नैवाधिकं पीतये ॥ किं तूद्धान्तपतयंतगपवनन्यालोलीदीपांकुर- च्छायाचंचलमाकलव्य सकलं सतो बनांतं गताः ॥६८॥
क्या सन्तोके रहनेके लिये उत्तमोत्तम महल न थे, क्या सुनने के लिये उत्तमोत्तम गान न थे, क्या प्यारी-प्यारी स्त्रियोंके संगम का सुख न था, जो वे लोग बनोमें रहनेको गये ? हाँ, सब कुछ था ; पर उन्होंने इस जगत्को गिरने वाले पतंगके पछोसे उत्पन्न हवासे हिलते हुए दीपक की छायाके समान चञ्चल समझकर छोड़ दिया ; अथवा उन्होंने मूर्ख पतंगकी भाँति, जो हवासे हिलते हुए दीपक की छायामें घूम-घूमकर अपने तर्जि जलाकर भस्म कर देता है, संसारको अपना नाश कराते देखकर संसारको छोड़ दिया ॥६८॥
यह संसार दीपक की लोहे के समान है और इसमें बसने वाले जीव पतङ्गोंके समान हैं। जिस तरह मूर्ख पतङ्ग दीपक