भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २४३ )

इयं बाला मां प्रत्यनवरतभिन्दीवरदल प्रभाचोरं चक्षुः क्षिपति किमभिप्रेतमनया ॥

गतो मोहोऽस्माकं स्मरकुसुमवाण्यव्यतिकर-

ज्वलज्ज्वाला शान्ता तदपि न वराकी विरमति ॥६७॥

यह बाला ल्नी सुम्र पर बार-बार नील कमलकी शोभासे भी सुन्दर नेत्रोंके कटाक्ष क्यों मारती है ? मैं नहीं समझता, इसका क्या मतलब है ? अब तो मेरा मोह जाता रहा है—कामके पुष्प-वाणोंसे निकली हुई आगकी ज्वाला शान्त हो गई है। आश्चर्य है, कि अब तक भी यह मूर्खा बाला अपनी कोशिशोंसे बाजू नहीं ब्राती ! ॥६७॥

जिनका मोह-जाल कट जाता है, जिनकी विषयवासना बुझ जाती है, जो स्त्रियोंकी असलियत को समझ जाते हैं, जो उनको नरककी नसेनी समझ लेते हैं, उनपर स्त्रियोंके कटाक्ष-वाण असर नहीं करते। हाँ, वे अपने स्वभावानुसार अपने तीखे-तीखे वाण चलाया ही करती हैं—अपने जाल बिछाया ही करती हैं ; पर तत्त्ववित् लोग उनके जालमें नहीं फँसते। उन पर उनके अचूक वाण फँल हो जाते हैं।

दोहा ।

केहि कारण डारत वयन, कमलनयन यह नार ।

मोह काम मेरे नहीं, तज न तिय-चित् हार ॥६७॥

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