भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 343

( २४२ )

ऐ वाला ! अब तू लीलासे अपनी आधी खुली आँखोंसे मुझ पर क्यों कटाक्ष-वाण चलाती है ? अब तू काममद पैदा करने वाली दृष्टि को रोक ले ; तेरे इस परिश्रम से तुझे कोई लाभ न होगा । अब हम पहले जैसे नहीं रहे हैं । हमारी जवानी चली गई है । अब हमने वनमें रहनेका निश्चय कर लिया है और मेहत्याग दिया है ; अब हम विषय-सुखों को तृण से भी निकम्मा समझते हैं ॥३॥

महाकवि दाग कहते हैं :—

तोवा जो मैंनेकी, निकल आया ज़रासा मुँह ।

वह रंग रूप ही नहीं, सुबहे बहारका ॥

बसन्त को अपने सौन्दर्यका बड़ा अभिमान था । जबसे मैंने शराब पीनेसे तोबा कर ली है, तबसे बसन्त-लक्ष्मीका मुँह फोका पड़ गया है । जब तक मैं शराबी था, तभी तक उसकी शोभाका कायल था । अब तो मुझे उसमें कुछ भी विशेषता मालूम नहीं होती ।

66. O young lady, why art thou playfully peeping at us out of half-closed eyes ? Stop thy love-inspiring glances as all thy labour will be fruitless. Now we are different from what we were before. Our youth has gone. We are now bent on living in the forest. Our attachments have been given up and we look at the enjoyments of the world like a worthless straw.