भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २४१ )

तक नरकमें ही हैं; पर मैं विवेक-बुद्धिसे काम लेकर, नरकसे निकलकर स्वर्गमें आ गया हूँ। आप अभी तक दुःखके बीज ही बो रहे हैं; पर मैं अब सुखके बीज बो रहा हूँ। मित्र! तुम भी मेरी तरह उन भयङ्कर जञ्जालोंको छोड़ कर, मेरी जैसी सुखको राह पर क्यों नहीं आ जाते? मित्रवर ! इसी राहमें सुख है; उस राहमें घोर दुःख और नरकयातनायें हैं। संसारको छोड़ने और भगवत् से-प्राप्ति करनेमें बड़ा आनन्द है। उस्ताद् जौकने कहा है:—

दुनियासे जौक, रिश्तये उल्फतको तोड़ दे ।

जिस सरका है यह बाल, उसी सरमें जोड़ दे ॥

दोहा ।

तुम-हम हम-तुम एक हैं, सब विधि रखो अमेद ।

अब तुम-तुम हम-हमहि हैं, भयो कठिन यह मेद ॥

65. I had such a staunch connection with you before that it seemed as if you were I and I was you. What has happened now that you have become yourself and I myself again?

बाले लीलामुकुलितममीन्धरा दधिप्राता:

किं चिप्प्यते विरमं विरमं व्यर्थ एव अमस्ते ॥

संपत्यन्ये वयमुपरतं बाल्यमाप्नोत् वनान्ते

जीणो मोहस्तृणमिव जगन्जालमालोकयामः ॥ ६६ ॥

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