वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 342, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २४१ )
तक नरकमें ही हैं; पर मैं विवेक-बुद्धिसे काम लेकर, नरकसे निकलकर स्वर्गमें आ गया हूँ। आप अभी तक दुःखके बीज ही बो रहे हैं; पर मैं अब सुखके बीज बो रहा हूँ। मित्र! तुम भी मेरी तरह उन भयङ्कर जञ्जालोंको छोड़ कर, मेरी जैसी सुखको राह पर क्यों नहीं आ जाते? मित्रवर ! इसी राहमें सुख है; उस राहमें घोर दुःख और नरकयातनायें हैं। संसारको छोड़ने और भगवत् से-प्राप्ति करनेमें बड़ा आनन्द है। उस्ताद् जौकने कहा है:—
दुनियासे जौक, रिश्तये उल्फतको तोड़ दे ।
जिस सरका है यह बाल, उसी सरमें जोड़ दे ॥
दोहा ।
तुम-हम हम-तुम एक हैं, सब विधि रखो अमेद ।
अब तुम-तुम हम-हमहि हैं, भयो कठिन यह मेद ॥
65. I had such a staunch connection with you before that it seemed as if you were I and I was you. What has happened now that you have become yourself and I myself again?
बाले लीलामुकुलितममीन्धरा दधिप्राता:
किं चिप्प्यते विरमं विरमं व्यर्थ एव अमस्ते ॥
संपत्यन्ये वयमुपरतं बाल्यमाप्नोत् वनान्ते
जीणो मोहस्तृणमिव जगन्जालमालोकयामः ॥ ६६ ॥
२६