वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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कोई किसीका नहीं है। अच्छी तरह ठोक बजा या जाँच पड़-ताल कर देख लिया।
हे कबीर ! पैरोंमें रस्सी पड़ी हुई है। फिर भी तू सुख-चैनमें कैसे सो रहा है? देख, इस दुनियासे कूच करनेका आस-रूपी नगाड़ा दिन-रात बज रहा है !
अगर तू इस चौपड़के खेलमें न चेतोगा, इस जन्ममें भी होश न करेगा, पशुकी तरह शरीरको पाछेगा और रामको नहीं जानेगा ; तो अन्तमें तेरे मुँहमें धूल पड़ेगी।
छपय ।
महल महारमणीक, कहा बसिने नहीं लायक ?
नाहिन सुनवे जोग, कहा जो गावत गायक ?
नवतरुणी के संग, कहा सुखहूँ नहीं लागत ?
तो काहे को छँड़-छँड़, ये बन को भागत ?
इन जान लियो या जगतको, जैसे दीपक पवनमें ।
बुझिजात छिनकमें छवि भर्यो, होत अँधेरो भवनमें ॥६८॥
अतीव सुन्दर और रमणीक महल क्या बसने योग्य नहीं हैं ? गवैये जो मनोहर गाना गाते हैं, क्या वह छनने योग्य नहीं है ? नवीना बाला स्त्रियों के साथ रम्या करनेमें क्या आनन्द नहीं आता ? अगर इन सबमें आनन्द और सुख है, तो फिर लोग इन सबको छोड़-छोड़ कर बनमें क्यों भागे जाते हैं ? इसलिये भागे जाते हैं, कि उन्होंने इस जगत्को उस दीपकके समान समझ लिया है, जो हवामें रखा हुआ है और ज्वा-भरमें उफ-जाता है।