भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 349

( २४६ )

कोई किसीका नहीं है। अच्छी तरह ठोक बजा या जाँच पड़-ताल कर देख लिया।

हे कबीर ! पैरोंमें रस्सी पड़ी हुई है। फिर भी तू सुख-चैनमें कैसे सो रहा है? देख, इस दुनियासे कूच करनेका आस-रूपी नगाड़ा दिन-रात बज रहा है !

अगर तू इस चौपड़के खेलमें न चेतोगा, इस जन्ममें भी होश न करेगा, पशुकी तरह शरीरको पाछेगा और रामको नहीं जानेगा ; तो अन्तमें तेरे मुँहमें धूल पड़ेगी।

छपय ।

महल महारमणीक, कहा बसिने नहीं लायक ?

नाहिन सुनवे जोग, कहा जो गावत गायक ?

नवतरुणी के संग, कहा सुखहूँ नहीं लागत ?

तो काहे को छँड़-छँड़, ये बन को भागत ?

इन जान लियो या जगतको, जैसे दीपक पवनमें ।

बुझिजात छिनकमें छवि भर्यो, होत अँधेरो भवनमें ॥६८॥

अतीव सुन्दर और रमणीक महल क्या बसने योग्य नहीं हैं ? गवैये जो मनोहर गाना गाते हैं, क्या वह छनने योग्य नहीं है ? नवीना बाला स्त्रियों के साथ रम्या करनेमें क्या आनन्द नहीं आता ? अगर इन सबमें आनन्द और सुख है, तो फिर लोग इन सबको छोड़-छोड़ कर बनमें क्यों भागे जाते हैं ? इसलिये भागे जाते हैं, कि उन्होंने इस जगत्को उस दीपकके समान समझ लिया है, जो हवामें रखा हुआ है और ज्वा-भरमें उफ-जाता है।

वैराग्य शतक · पृष्ठ 349, कुल 648 में से · BharatKosha