वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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68. Were there no comfortable mansions for the holy men to live in or musicians' songs to hear or the pleasure of the company of dearly loved women to enjoy, that these holy men went to live in the forests ? Finding all the mankind bent upon self-destruction like the foolish moth, which flies here and there in the shade of a lamp seeking to throw itself on its flame which is continually being flattered by the wind, they went to the forests.
किं कन्दःकन्दरेभ्यःप्रलयमुपगता निर्धरा वा गिरिस्थः
प्रवृत्स्ता वा तरुभ्यःसरसफलभूतो वल्कलिन्मथ श्राखाः॥
वीच्यन्तेयन्मुखानि प्रसभभगतप्रथयाणां खलानां
दुःखोपात्ताल्पवित्तसम्यवशपवनानर्तितश्रूतानि ॥६६॥
क्या पहाड़ोंकी गुफाओंमें कन्दमूल और उनकी चट्टानोंमें पानी के भरने नहीं रहे, क्या डाल वाले वृक्षोंमें रसीली फलवती शाखायें नहीं रही, जो लोग उन अभिमानी और नीचोंके सामने दीनता करते हैं, जिनकी माँहें मारे अभिमानके चढ़ी रहती हैं और जिन्होंने बड़े कष्टसे थोड़ासा धन जमा कर लिया है ? ॥६६॥
पहाड़ों में रहने को गुफायें, खाने को कन्दमूल, पीने को उनके भरनों का जल और वृक्षोंमें मीठे-मीठे रसीले फल मौजूद हैं ; फिर भी लोग उन धनियों की टेढ़ी भुकुटियों को क्यों देखते हैं, उनकी टेढ़ी-सुधी क्यों सहते हैं, जिनकी आँखें उस थोड़े से धनके मद से नहीं खुलतीं, जो उन्होंने बड़े-बड़े कष्टों से येनकेन प्रकारेण जमा कर लिया है ! ऐसे नीच