भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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अभिमानियों से अपमानित होने की अपेक्षा पहाड़ों में रहना और फलमूल तथा शीतल जल पर गुज़ारा करना भला । इस से उनकी आत्मा खूब सुखी होगी ; अभिमानी नीच धनियोंकी बुढ़ी बातोंसे आत्मा जल-जल कर खाक होती है ।

अगर कुछ भी समझ हो, जरा भी आत्मप्रतिष्ठा का खयाल हो, तो मनुष्य को अपनी “इच्छा” का नाश करना चाहिये । इच्छा-रहित मनुष्य सात विलायतों के बादशाह को भी तुच्छ समझता है । धनियों से दीनता करना और माँगना बड़ी बुढ़ी बात है । देखिये, गोस्वामी तुलसीदासजी प्रभुति महा पुरुषों ने कहा है :—

तुलसी कर पर कर* करो, कर तर कर न करो ।

जा दिन कर तर कर करो, ता दिन मरन करो ॥

माँगन मरण समान है, मत कोई माँगो भीख ।

माँगन ते मरना भला, यह सतगुरुकी सीख ॥

तुलसीदासजी कहते हैं—हे प्रभु ! हाथपर हाथ करो, हाथ के नीचे हाथ न करो । जिस दिन हाथके नीचे हाथ करो, उस दिन हमारी मौत हो जाय । मतलब यह है कि, जब तक हम दूसरोंको देते रहें, तबतक हम जीवित रहें ; जिस दिन हमारी माँगनेकी नौबत आ जाय, उस दिन हम मर जायँ ।

✽ कर पर कर करो=पराये हाथके ऊपर हमारा हाथ रहे—हम देते रहें । लेने वालेका हाथ लेने वालेके हाथके ऊपर रहता है और लेने वालेका हाथ दाताके हाथके नीचे रहता है ।