भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २४६ )

माँगना मरनेके बराबर है। इसलिये कोई भी भीख न माँगो। सतगुरुको शिक्षा है कि, माँगनेसे मर जाना भला।

अगर दीनता ही करनी हो तो परमात्मा से करो। उसके आगे दीनता करनेसे सभी इच्छायें पूरी हो सकती हैं। कहा है :—

तेरी बन्दानवाजी, हफ्त किशवर वर्षमा देती है।

जो तू मेरा—जहाँ मेरा, धरव मेरा, अजम मेरा ॥ दाग ॥

तेरी सेवा करनेसे सातों वलायतों का राज मिल जाता है। जब तू अपना हो जाता है ; तब सभी अपने हो जाते हैं। कबीरने कहा है :—

थोड़ा सुमिरत बहुत सुख, जो करि जाने कोय ।

सुत लगै न बिनावनी, सहजै तनसुख होय ॥

साई सुमिर, मत दौल कर; जा सुमरे ते लाह ।

वहाँ खलक खिदमत करे, वहाँ अमरपुर जाह ॥

भगवान्की थोड़ीसी याद करनेसे ही बहुत सुख होता है, वशसे कि कोई याद करना जाने। इसमें न तो सूत लगता है और न बिनवाई देनी पड़ती है ; सहजमें आनन्द होता है।

हे मनुष्य ! स्वामीको सुमरण करनेमें देर न कर। उसके सुमरणमें बहुत लाभ है। जो स्वामीको याद करता है, इस दुनियामें संसारी लोग उसकी सेवा करते हैं और जब मर कर दूसरी दुनियामें जाता है, तब स्वर्गपुरीमें बसता है।

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