वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( २४६ )
माँगना मरनेके बराबर है। इसलिये कोई भी भीख न माँगो। सतगुरुको शिक्षा है कि, माँगनेसे मर जाना भला।
अगर दीनता ही करनी हो तो परमात्मा से करो। उसके आगे दीनता करनेसे सभी इच्छायें पूरी हो सकती हैं। कहा है :—
तेरी बन्दानवाजी, हफ्त किशवर वर्षमा देती है।
जो तू मेरा—जहाँ मेरा, धरव मेरा, अजम मेरा ॥ दाग ॥
तेरी सेवा करनेसे सातों वलायतों का राज मिल जाता है। जब तू अपना हो जाता है ; तब सभी अपने हो जाते हैं। कबीरने कहा है :—
थोड़ा सुमिरत बहुत सुख, जो करि जाने कोय ।
सुत लगै न बिनावनी, सहजै तनसुख होय ॥
साई सुमिर, मत दौल कर; जा सुमरे ते लाह ।
वहाँ खलक खिदमत करे, वहाँ अमरपुर जाह ॥
भगवान्की थोड़ीसी याद करनेसे ही बहुत सुख होता है, वशसे कि कोई याद करना जाने। इसमें न तो सूत लगता है और न बिनवाई देनी पड़ती है ; सहजमें आनन्द होता है।
हे मनुष्य ! स्वामीको सुमरण करनेमें देर न कर। उसके सुमरणमें बहुत लाभ है। जो स्वामीको याद करता है, इस दुनियामें संसारी लोग उसकी सेवा करते हैं और जब मर कर दूसरी दुनियामें जाता है, तब स्वर्गपुरीमें बसता है।
( २५० )
क्षप्य ।
कहा कन्दराहीन भये, पर्वत भूतल से ?
भरना निर्जल भये कहा, जे पूरित जल से ?
कहा रहे सब वृक्ष, फूल-फल-बिन सुरभाये ?
सहे खलनके वैन, ग्रन्थता जो मद छाये ।
कर संचित धन जे स्वरूप हूँ; इत उत फेरें भू विकट ।
रे मन ! तू भूल न जाहु कई, इन खल पुरुषनके निकट ॥६६॥
69. Have the wild roots in the caves of mountains and the springs of water flowing out of rocks disappeared or the branches of trees bearing juicy fruits been destroyed, that people look supplicatingly towards the faces of proud and evil-minded persons, whose brows often contract with vanity owing to the little wealth, which they possess after having laboured hard for it ?
गंगातरंगकण्डीकरशीतलानि
विद्याभराध्युपितचारुशिलातलानि ॥
कन्दराहीन-बिना गुफाओंके । भूतल-पृथ्वी । निर्जल-बिना जलके । पूरित-भरे हुए । खलन-दुष्टों । वैन-बाते । कर संचित-इकट्टा करके । जे-जो । स्वरूप हूँ-थोड़ासा भी । इत उत-उधर उधर । भू-भौँ । भूल न जाहु-भूल कर भी न जा । क्या पर्वतोंमें गुफाये नहीं रही, क्या भरनोंका जल सूख गया, क्या वृक्षोंमें फल-फूल नहीं रहे, जो तू मदान्व दुष्टोंको तानेजती सहता है ? जो थोड़ासा भी धन सन्चय करके भौखोंको टेढ़ी करते हैं, उन दुष्टोंके पाँख है मन ! तू भूलकर भी मत जा ।
( २५१ )
स्थानानि किं हिश्वतः प्रलयं गतानि
यत्सावमानपरिण्डरता मनुष्याः ॥७०॥
हिमालय पर्वतकी वे चट्टानें जो गंगाजलकी लहरोंसे उठे हुए छाँटोंसे शीतल हो रही हैं और जहाँ जगह-जगह विद्याधर बैठे हैं क्या अब नहीं रही हैं, जो लोग अपमानसे मिले हुए पराये टुकड़ों पर गुजर करते हैं ? ॥७०॥
पराये टुकड़ों पर गुजर करनेकी अपेक्षा मर जाना भला है। अगर माँगना ही हो, तो माँगने की विधि चातक से सीखनी चाहिये। वह एक से ही माँगता है, दूसरेसे हर-गिज़ नहीं माँगता, चाहे मर क्यों न जाय, और माँगनेमें भी यह खूबी, कि वह कभी अधीन होकर नहीं माँगता, खिर नवाकर नहीं लेता। वह छोटोंसे नहीं माँगता; एक घन-श्याम ( बादल ) से ही माँगता है। चातकके समान याचक और वापिद ( बादल ) के समान दानी जगत्में कौन है ? जो ओछोंसे माँगते हैं, जने-जनेके पैर पकड़ते हैं, उनको चिकार है ! इसलिये मनुष्यों ! पपहिये की तरह एकमात्र घनश्याम से ही माँगो। महात्मा तुलसीदासजीने कहा है:—
“तुलसी” तीनों लोक मैं, चातक ही को माथ ।
सुनियत जासु न दीनता, किये दूसरो नाथ ॥
ऊँची जाति पीहरा, नीचो पियत न नीर ।
कै याचै घनश्याम सों, कै दुख सहे शरीर ॥
( २५२ )
हूँवे अधीन चातक नहीं, शीश नाय नहीं लेय । ऐसे मानी मँगनहिं, को वारिद बिन देय ? ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—तीनों लोकोमें सिर्फ एक पपहिये का ही सिर ऊँचा है, क्योंकि उसने अपने स्वामी खातीके सिवा और किसीसे कभी दीनता नहीं की ।
पपहियेकी जाति ऊँची है; क्योंकि वह नदियों और तालाबों वगैरः जलाशयोंका पानी नहीं पीता । वह या तो धनश्यामसे यानी खाती नक्षत्रमें बाढ़लसे ही माँगता है अथवा दुःख भोगता है ।
पपहिया और मँगतोंकी तरह अधीन होकर और सिर नवाकर नहीं लेता । वह तो मानके साथ ही लेता है । ऐसे मानी मँगतेको बाढ़लके सिवा और कौन दे सकता है ?
जिनको परमात्माने देने-लायक बनाया है, उन्हें दिल खोल कर गरीब और मुहताजोंकी देना चाहिये । जो देते हैं, फिर पाते हैं और जो देते हैं उन्हींका जीवन सफल है । रहीम कवि कहते हैं:—
दोहा ।
दीनहि सबको लखत है, दीन लखे नहिं कोय । जो “रहीम” दीनहिं लखत, दीनबन्धु-सम सोय ॥ “रहियन” बे नर मर चुके, जे कई मँगन जाहिं । उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं ॥
( २५३ )
तवही लग जीवो भलो, दीवो परे न धीम ।
विन दीवो जीवो जगत, हमें न रुचे ‘रहीम’ ॥
दीन या मुहताज सबकी तरफ देखता है, पर दोनकी तरफ कोई नहीं देखता । रहीम कहते हैं, जो दीनकी तरफ देखता है, वह दीनबन्धु भगवान् के समान होता है ।
रहीम कहते हैं, वे मनुष्य मर गये जो कहीं माँगने जाते हैं । उनसे पहले वे मरे, जिनके मुँहसे नाहीं निकलती है । मतलब यह है, माँगता तो मरा हुआ है ही, पर जो माँगने वालेको नहीं देता, वह उससे भी पहले मरा हुआ है ।
जीना तभी तक अच्छा है जब तक देना मन्द न हो । बिना दान किये जीना, रहीम कहते हैं, हमें अच्छा नहीं लगता ।
दोहा ।
गंगातट गिरिवर गुफा, उहाँ कहा चहि ठौर ? ।
क्यों एते अपमान सों, खात पराये कौर ? ॥७०॥
70. Have the grounds in the Himalaya mountains the stones of which are washed by the cold spray arising from water of the river Ganges and which are the favourite resort of Vidyadharas been destroyed, that men like to depend upon other people's charity, even when it is disrespectfully given ?
गिरिवर गुफा=पहाड़ोंकी गुफा । उहाँ=वहाँ । कहा=क्या । ठौर=जगह । एते=इतने । खात=खाता है । पराये कौर=पराये ठुकरे । क्या गंगाकिनारेके पहाड़ोंकी गुफाओंमें जगह नहीं रही, जो इतना अपमान सह कर पराये ठुकरे तोड़ता है ?
( २५४ )
यदा मेहः श्रीमान्नपतति युगान्ताग्निनितः
समुद्राः शुष्यन्ति प्रचुरनिकराहानिलयाः ॥
धरा गच्छत्यन्तं धरणिधरपादैरपि धृता
शरीरिका वार्ता करिकलभकर्णग्रिचपले ॥७१॥
का
सिः
ता
धन
दुः
नव
मा
क
पा
का
जब प्रलयकालकी अग्निके मारे श्रीमान् सुमेरु पर्वत गिर पड़ता है ; मगर-मच्छोंके रहनेके स्थान समुद्र भी सूख जाते हैं ; पर्वतोंके पैरोसे दबी हुई पृथ्वी भी नाश हो जाती है ; तब हाथीके कानकी कोरके समान चञ्चल मनुष्यकी क्या गिन्ती ? ॥७१॥
जब काल सुमेरु जैसे पर्वतोंको जला कर गिरा देता है, महासागरोंको सुखा देता है, पृथ्वीको नाश कर देता है, तब इस छोटेसे चञ्चल मनुष्यकी क्या गिन्ती ? इसके नाश होने में कौनसा आश्चर्य ?
दोहा ।
मेरु गिरत सूखत जलधि, धरनि प्रलय हवै जात !
गजसुतके श्रुति चपल ल्यों, कहा देहकी बात ? ॥७२॥
मेरु=उमेरु पर्वत । जलधि=समुद्र । धरनि=पृथ्वी । प्रलय=नाश । गजसुत=हाथीका बच्चा । श्रुति=कान । चपल=चंचल । मेरु=बात=उमेरु गिर पड़ता है, समुद्र सूख जाता है और पृथ्वी नाश हो जाती है, तब हाथीके बच्चेके कानकी तरह चञ्चल देह किस गिन्तीमें है ?
( २५५ )
71. When even the great Meru collapses, burnt away by the Mahapralaya fire,* when even the oceans which are the home of huge crocodiles and sharks are at last dried up and when the earth itself is destroyed although; it is held fast by the feet of great mountains, what should we say of the human body which is as shaky as the ear of an infant elephant?
एकाकी निःस्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिगम्बरः ॥
कदा शम्भो भविष्यामि कर्मनिर्मूलनक्षमः ॥७२॥
हे शिव ! मैं कब अकेला, इच्छा-रहित और शान्त हूँगा ? कब हाथ ही मेरा पात्र होगा और कब दिशायें मेरे वक्ष होंगे ? मैं कब कर्मोंकी जड़ उखाड़नेमें समर्थ हूँगा ? ॥७२॥
एकान्त वास करना, इच्छाओंको त्याग देना, शान्त रहना, हाथसे ही पानी वगैरः पीनेके बर्तनका काम लेना, दिशाओंको ही वस्त्र समझना ; यानी नम्र रहना और कर्मोंकी जड़ उखाड़नेमें समर्थ होना—ये ही कल्याणके मार्ग हैं। जिनमें ये गुण हैं, वे धन्य हैं और वे ही सच्चे सुखिया हैं।
दोहा ।
एकाकी इच्छा-रहित, पाणिपात्र दिगवस्त्र ।
शिव शिव ! हँ कब होऊँगो, कर्मशत्रुको शस्त्र ? ॥७२॥
- The fire at the time of universal destruction.
एकाकी = अकेला । इच्छा रहित = बिना इच्छाओंके । पाणिपात्र =
( २५६ )
72, O Shiva, when shall I be alone, desireless, peaceful, with hands only to be used as receptacles for water etc., with space only in place of garments and fit for exterminating the roots of Karma (actions) ?
पासाः श्रियः सकलकामदुधास्ततः किं
दत्तं पदं शिरसि विद्विषतां ततः किम् ॥
समानिताः प्रणयिनो विषवैस्ततः किम्
कल्पं स्थितं तदुभृतां तदुभित्ततः किम् ॥७३॥
जीर्णां कथा ततः किं सितममलपटं पटसुत्रं ततः किं
एका भायां ततः किं हयकरिसुगणैराड्रुतो वा ततः किम् ॥
भक्तं सुक्तं ततः किं कदशनमथ वा वासरोते ततः किं
व्यक्त ज्योतिर्निर्वातमथितभवभयं वैभवं वा ततः किम् ॥७४॥
अगर मनुष्योंको सब इच्छाओंके पूर्ण करनेवाली लक्ष्मी मिली तो क्या हुआ ? अगर शत्रुओंको पदानत किया तो क्या ? अगर धन से मित्रोंकी खातिर की तो क्या ? अगर इसी देहसे इस जगत्में एक कल्प तक भी रहे तो क्या ? ॥७३॥
अगर चिथड़ोंकी बनी हुई गुदड़ी पहनी तो क्या ? अगर निर्मल सफेद वस्त्र पहने या पीताम्बर पहने तो क्या ! अगर एक ही स्त्री
हाथका बतन । दिग् = दिशाएँ । वस्त्र = कपड़े । हौं = मैं । कर्म शत्रु = कर्म रूपी शत्रु का शस्त्र = काटने वाला डथियार ।
( २५७ )
रही तो क्या ? अगर अनेक हाथी-घोड़ों सहित अनेकों ख़ियाँ रहीं तो क्या ? अगर नाना प्रकारके व्यञ्जन भोजन किये अथवा शामको मामूली खाना खाया तो क्या ? चाहे जितना विभव पाया, पर यदि संसार-वन्धनको मुक्त करनेवाली आत्मज्ञानकी ज्योति न जानी, तो कुछ भी न पाया और कुछ भी न किया ॥७४॥
मतलब यह है, सारे संसारके राज्य-वैभव अथवा त्रिभुवन के अधिपति होनेमें भी जो आतन्त्र नहीं है, वह आत्मज्ञान या ब्रह्मज्ञानमें है । आत्मज्ञान होनेसे ही मनुष्य, जीवन-मरणके कष्टसे छुटकारा पाकर, परम शान्ति-लाभ करता है ।
अर्ब सर्व लो द्रव्य है, उदय अस्त लो राज ।
जो तुलसी निज मरन है, तौ आवे केहि काज ॥
अगर अरब-खरब तक धन हो और उद्याचलसे अस्ताचल तक राज हो, तोभी अगर अपना मरण हो, तो ये सब किस कामके ? धन-दौलत और राजपाट सब जीते रहने पर काम आते हैं, मरने पर इनसे कोई लाभ नहीं ।
दोहा ।
इन्द्र भये धनपति भये, भये शत्रु के साल ।
कल्प जिऐ तौऊ गये, अन्त कालके गाल ॥७४॥
इन्द्र = देवताओंका राजा । धनपति = धनेश, कुबेर । कल्प = ब्रह्मा का एक दिन, जो हमारे ४३२०००००००० बरसोंके बराबर होता है । अगर
१७

(चित्र: राजसभा एवं पण्डित मण्डली)
( २५६ )
भय हो, कुटुम्बियोंमें स्नेह न हो, मनसे काम-विचार दूर हो और संसर्ग-दोषसे रहित होकर जंगलमें रहते हों ॥७५॥
परमात्मा में प्रेम होना, मनमें जन्म-मरण का भय होना, रिश्तेदारों से प्रेम न होना, मनमें स्त्रीको इच्छा का न उठना, एकान्तस्थानमें अकेले वन में निवास करना—ये ही तो वैराग्य के पूरे लक्षण हैं। इनसे अधिक वैराग्य के और लक्षण नहीं।
दोहा ।
मन विरक्त हरिभक्ति-युत, संगी वन तृणडाभ ।
याहूते कछु और है, परम अर्थको लाभ ? ॥७५॥
75. What greater renunciation should we wish for, if we have the following virtues,—Love of God, the fear of birth and death in our mind, no attachment with our relatives, no disturbance of Cupid's doing and residence in the lonely forest, free from the evils of society.
तस्मादनन्तमजरं परमं विकासि-
तद् ब्रह्म चिन्तय किमेभिरसद्विकल्पैः ॥
यस्यानुषंगिण इमे सुवनाधिपत्य-
भोगादयः कृष्णलोकमता भवन्ति ॥७६॥
मन विरक्त हो—संसारी विषय-भोगोंमें आसक्ति न हो, मनमें हरकी भक्ति हो और बनके वास-पात हमारे साथी-संगी हों—इससे उत्तम परमाय का लाभ और क्या होगा ?
( २६० )
इसवास्ते मनुष्यो ! अनन्त, अजर, अमर, अविनाशी और शान्तिपूर्ण ब्रह्मका ध्यान करो । मिथ्या जन्मलालोमें क्या रक्खा है ? जो ब्रह्मका ज़रासा भी आनन्द पा जाते हैं, उनकी नज़रोंमें ससारी राजाओंका आनन्द तुच्छ जँचता है ॥७९॥
मतलब यह है कि लोगों को अनन्त, अजर, अमर, अविनाशी, शोक-रहित, शान्तिपूर्ण ब्रह्म का ध्यान करना चाहिये । उसी के ध्यान में पूर्णानन्द है ; संसार के भोग-विलासोंमें ज़रा भी आनन्द नहीं । वह आनन्द सदा है ; यह आनन्द क्षणिक है । उसमें सदा सुख है ; इसमें सदा दुःख है । जिनको ब्रह्मानन्द का ज़रासा भी मज़ा आ जाता है, वे त्रिलोकी के अधिपति के आनन्द को भी तुच्छ समझते हैं । राज, धन-दौलत और स्त्री-पुत्र प्रभृति सब उस परमात्माके पीछे हैं ; इसलिये इनको छोड़ कर उससे ही प्रीति करने में चतुराई है ।
दोहा ।
ब्रह्म अखण्डानन्द पर, सुमिरत क्यों न निशंक ।
जाके छिन्न-संसर्ग सों, लगत लोकपति रंक ? ॥७९॥
76. Therefore O men, meditate upon BRAHMA, the Endless, the Indestructible and the Blissfull. What is the
हे मनुष्य ! उस अखण्ड-पूर्ण ब्रह्म परमात्माको निःशङ्क होकर क्यों नहीं भजता, जिसके तृष्ण-भरके संसर्गसे बड़े-बड़े राजा-बादशाह भी तुच्छ भिखारीसे मालूम होते हैं ?
( २६१ )
use of other false considerations? In the eyes of men who think of this BRAHMA the enjoyments obtainable by the worldly monarchs appear only to be but very poor acquisitions.
पातालमाविशसि यासि नभो विलंघ्य
दिङ्मण्डलं भ्रमसि मानस चापलेन ॥
आन्यापि जातु विमलं कथमात्मनीतं
तद्वन्न न स्मरसि निर्धतिमेपि येन ॥७७॥
हे चित्त ! तू अपनी चञ्चलताके कारण पातालमें प्रवेश करता है, आकाशसे भी परे जाता है, दशों दिशाओंमें धूमता है ; पर भूलसे भी तू उस विमल परमब्रह्मकी याद नहीं करता, जो तेरे हृदय में ही मौजूद है, जिसके याद करनेसे ही तुझे परमानन्द—मोक्ष—मिल सकती है ! ॥७७॥
इस चञ्चल मन की अदृढ़ लीला है। यह कभी आकाश में जाता है, कभी पाताल में जाता है और कभी दशों दिशाओं में फिरता है। इधर-उधर तो इतना भटकता है ; पर, भूल कर भी, जहाँ जाना चाहिये वहाँ नहीं जाता। उसके पास ही अमृत का सरोवर है, उसे छोड़ कर सड़ी-गली नालियों में फिरता है। उसे सब जगह छोड़ कर अपने हृदय में ही बैठे हुए ब्रह्म के पास जाना चाहिये और हर समय उसकी ही विरक्तता करनी चाहिये ; इस से उसके पापों का नाश हो
( २६२ )
जायगा, आवागमन से छुटकारा मिल जायगा एवं परम शान्ति की प्राप्ति होगी। और चिन्ताओं से कोई लाभ नहीं; उन से तो जज्जालोंमें ही फँसना होता है।
मूर्ख लोग अन्वत्त तो परमात्मा में दिल ही नहीं लगाते। यदि मूर्खसे लगाते भी हैं, तो परमात्माकी खोजमें जहाँ-तहाँ मारे-मारे फिरते हैं; पर अपने हृदयमें ही उसे नहीं खोजते! यह उनका महा अज्ञान है। उस्ताद जौक ने कहा है:—
वह पहलुमें बैठे हैं और बदगुमानी,
लिये फिरती सुभको, कहीं का कहीं है ॥
वह (ईश्वर) बगलमें ही बैठा है, पर मैं भ्रममें फँसकर उसे दूँदने के लिये कहाँ-कहाँ मारा फिरता हूँ !
महात्मा कबीर कहते हैं :—
ज्यों नयनन में पूतली, त्यों खालिक घट माँहि।
मूरख नर जाने नहीं, बाहर दूँदने जाहि ॥
कस्तूरी कुण्डल बसै, मृग दूँदे बन माँहि।
ऐसे घट-घट ब्रह्म है, दुनिया जाने नाँहि ॥
समझा तो घर में रहे, परदा पलक लगाय।
तेरा साहिब तुम्हहि में, अन्त कहूँ मत जाय ॥
( २६३ )
महात्मा सुन्दरदास जी कहते हैं :—
कोउक जात प्रयाग बनारस ।
कोउ गया जगन्नाथहि धावै ॥
कोउ मथुरा बदरी हरिद्वार सु ।
कोउ गंगा कुरुक्षेत्र नहावै ॥
कोउक पुष्कर हवै पैँच तीरथ ।
दौरिहि दौरि जु द्वारिका आवै ॥
सुन्दर चित्त गहौ घरसौंहि सु ।
बाहिर दूँदत कँकुरि पावै ? ॥
जिस तरह आँखोंमें पुतली है, उसी तरह घट में ( हृदय-कमलमें ) पैदा करने वाला है ; पर मूर्ख इस बात को नहीं जानता और उसे बाहर खोजने जाता है ।
कस्तूरी हिरन की अपनी नाभिमें है, पर भुग उसे बन में खोजता है ; उसी तरह ब्रह्म घट-घट में है, पर दुनिया इस भेद को नहीं जानती ।
अगर समझता है तो घर में रह और पलकोंका पर्दा लगा कर देख, तेरा मालिक तेरे ही अन्दर है ; अन्यत्र जानेकी जरूरत नहीं ।
कोई परमेश्वर की खोजमें प्रयाग, काशी, गया, पुरी, मथुरा, कुरुक्षेत्र और पुष्कर जाता है और कोई द्वारका जाता है । सुन्दरदासजी कहते हैं, जो धन घर में गड़ा है, वह बाहर कैसे मिलेगा ?
( २६४ )
सारांश यह है, कि संसार अज्ञानान्धकारके कारण “छोरा बगल में ढंढोरा शहरमें” वाली कहावत चरितार्थ करता है। ईश्वर इसी शरीर के भीतर हृदय-कमल में मौजूद है, पर अज्ञानी लोग उसे पाने के लिए तीर्थोंमें भटकते फिरते हैं। इस तरह वह मिलता भी नहीं और बुधा हैरानी होती है। जो उसके दर्शन करना चाहें, वे नेत्र बन्द करके अपने हृदयमें ही उसे देखें।
कुण्डलिया ।
फाँघौं तें आकाश को, पठयौं तें पाताल । दशों दिशामें तू फिर्यो, ऐसी चञ्चल चाल ॥ ऐसी चञ्चल चाल, इतें कबहूँ नहीं आयौं । बुद्धि सदनको पाय, पाय छिनहूँ न लुबायौं ॥ देख्यौं नहीं निजरूप, कूप अमृतको छाँघौं । एरे मन मतिमुद् ! क्यों न भव-वारिधि फेंघौं ? ॥७७॥
77. O mind, thou, enterest into the lower world, soarest even higher than the heavens and wanderest all through the infinite space, never through mistake dost thou think of the pure BRAHMA, who rests within thy own self and who will bring thee salvation from all sins.
रात्रिः सेव पुनः स एव दिवसो भत्वा बुधा जनन्तवो भानन्त्युद्यमिन्स्तथैव निभृतभारभ्यतत्क्रियाः ॥
( २६५ )
व्यापारैः पुनरुक्तमुक्तविषयैरवविनेनामुना
संसारेण कर्दर्थिताः कथमहो मोहाच्च लज्जामहे ॥७८॥
प्राथियोर्मं बुद्धिमान यद्यपि जानते हैं कि दिन और रात ठीक पहलेकी तरह ही होते हैं ; तोभी वे उन्हीं काम-धन्धेके पीछे दौड़ते हैं, जिनके पीछे वे पहले दौड़ते थे । वे लोग उन्हीं-उन्हीं कामोंमें लगे रहते हैं, जिनसे क्षणिक और बारम्बार वही लाभ होते हैं, जिनके वे बारम्बार कह और भोग चुके हैं । आश्चर्य्यका विषय है, कि मनुष्योंको लज्जा नहीं आती ! ॥७८॥
देखते हैं, कि पहले की तरह ही दिन, रात, तिथि, वार, नक्षत्र और मास तथा वर्ष आते हैं और जाते हैं ; उसी तरह हम खाते-पीते, सोते-जागते और काम-धन्धे करते हैं ; कोई नई बात नहीं देखते । जिन कामों को पहले करते थे, उन्हेंही बारम्बार करते हैं । उनमें कितना सा लाभ और सुख है, इसे भी देखते-सुनते और समझते हैं । फिर भी ; आश्चर्य्य है कि, हम इस मिथ्या संसारसे मोह नहीं तोड़ते !
कुरुडलि्या ।
वेही निशि वेही दिवसः वेही तिथि वेही वार ।
वे उद्यम वेही क्रिया, वेही विषय-विकार ।
वेही विषय-विकार, सुनैत देखत अरु सूँघत ।
वेही भोजन भोग, जागि सोवत अरु ऊँघत ।
( २६६ )
महा निलज यह जीव ; भोग में भयो विदेही ।
अजहूँ पलटत नाहि, कटत गुण वे के वैही ॥७८॥
78. Even the wise among human beings, although knowing that the days and nights now present are exactly similar to those that have passed away, run busily after the same business transactions which they had engaged themselves before. It is a wonder why we are not ashamed of sticking to the same worldly enterprises, availing of petty advantages as have been already spoken and reaped the benefit by us over and over again !
मही रम्या शय्या विपुलमुपधानं सुजलता
वितानं चाकाशं व्यजनमनुकूलोऽयमनिलः ॥
स्फुरहीपरचन्द्रो विरतिवनितासंगमुदितः
सुखं शान्तः शैले मुनिरतद्व्यतिर्णु इव ॥७९॥
मुनि लोग राजा महाराजाओंकी तरह सुखसे जमीनको ही अपनी सुखदायिनी शय्या मान कर सोते हैं। उनकी भुजा ही उनका गुदगुदा तकिया है, आकाश ही उनकी चादर है, अनुकूल हवा ही उनका पंखा है, चन्द्रमा ही उनका चिराग है, विरक्ति ही उनकी स्त्री है ; अर्थात् विरक्ति-रूपी स्त्रीको लेकर, वे, उपेक्षातः सामानोंके साथ, राजाओंकी तरह सुखसे आराम करते हैं ॥७९॥
मुनि लोगोंके पास न राजाओंकी तरह महल है, न बद्धिया-बद्धिया पल्लग और मखमली गद्दे तकिये हैं, न ओढ़ने
( २६७ )
के लिये शाल-दुशाले हैं, न बिजलीके पट्टे हैं, न भाङ-फानूस या बिजलीकी रोशनी है और न भुगनयनी, मोहिनी कामिनी ही हैं ; तोभी वे ज़मीनको ही अपना पलंग, हाथको ही तकिया, शीतल हवाको ही पट्टा, चन्द्रमाको ही दीपक और संसारी विषय-भोगोंसे विरक्ति को ही अपनी स्त्री मान कर सुखसे सोते हैं। राजा-महाराजा और अमीर-उमरा बहिया-बहिया पलंग, क्रन्दहारी कालीन, मखमली गह-तकिये, बिजलीके पंखे और रोशनी तथा सुन्दरी स्त्रियोंके साथ जो मिथ्या सुख उपभोग करते हैं, उससे लाख दर्जन उत्तम और सच्चा सुख मुनि लोग ज़मीन और अपनी भुजा, अनुकूल हवा, चन्द्रमा तथा अपनी विरक्ति रूपिणी स्त्रीके साथ उपभोग करते हैं। अब बुद्धिमानोंको विचार करना चाहिये, कि उन दोनोंमें बुद्धिमान कौन है और वास्तविक सुख किसे मिलता है। अमीरोंको सुखके लिये कितने भङ्गभट करने पड़ते हैं और कितनी आफूतें उठानी पड़ती हैं ; तथापि उन्हें सच्चा सुख नहीं मिलता और मुनि लोग बिना भङ्गभट, बिना आफूत और बिना प्रयासके सच्चा सुख भोगते और शान्तिकी नींद सोते हैं।
छप्पय ।
पृथ्वी परम पुनीत, पलंग ताकी मन मान्यौ ।
तकिया अपनो हाथ, भुगनको तम्बू तान्यो ॥
पुनीत=पवित्र। भुगन=आस्मान। चन्द-चिराग=चन्द्रमा-चिराग
( २६८ )
सोहत चन्द चिराग, बीजना करत दशोंदिशि ।
बनिता अपनी वृत्ति, संगही रहत दिवस-निशि ॥
अतुल अपार सम्पत्ति सहित, सोहत है सुखमें मगन ।
मुनिराज महानुपराज ज्यों, पौड़े देखे हम हगन ॥७६॥
79. A sage sleeps in comfort and peace like a great king on the most comfortable sofa of the earth, with the soft pillow made of his own arm under his head, with the open sky above as his bed-cover, the congenial breeze serving him as a fan, the moon giving him the light of a lamp, enjoying the conjugal association of non-attachment with pleasures of life.
त्रैलोक्याधिपतित्वमेव विरसं यस्मिन्महाशासने
तल्लब्ध्वासनवस्त्रमानघटने भोगे रतिं मा कृथाः ॥
भोगः कोऽपि स एक एव परमो नित्योदितो जृम्भते
यत्त्वादाद्विरसा भवन्ति विषयास्त्रैलोक्यराज्यादयः ॥८०॥
हे आत्मा ! अगर तुम्हे उस ब्रह्मका ज्ञान होगाया है, जिसके सामने तीन लोकका राज्य तुच्छ मालूम होता है ; तो तू भोजन, वस्त्र और मानके लिए भोगोंकी चाहना मत कर ; क्योंकि वह भोग सर्वश्रेष्ठ और नित्य है ; उसके मुकाबलेमें त्रिलोकीके राज्य प्रभृति सुख कुछ भी नहीं हैं ॥८०॥
हे । बीजना = पंखा । बनिता = स्त्री । पौड़े देखे = सोते हुए देखे ।
हगन = आँखोसे ।