भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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use of other false considerations? In the eyes of men who think of this BRAHMA the enjoyments obtainable by the worldly monarchs appear only to be but very poor acquisitions.

पातालमाविशसि यासि नभो विलंघ्य

दिङ्मण्डलं भ्रमसि मानस चापलेन ॥

आन्यापि जातु विमलं कथमात्मनीतं

तद्वन्न न स्मरसि निर्धतिमेपि येन ॥७७॥

हे चित्त ! तू अपनी चञ्चलताके कारण पातालमें प्रवेश करता है, आकाशसे भी परे जाता है, दशों दिशाओंमें धूमता है ; पर भूलसे भी तू उस विमल परमब्रह्मकी याद नहीं करता, जो तेरे हृदय में ही मौजूद है, जिसके याद करनेसे ही तुझे परमानन्द—मोक्ष—मिल सकती है ! ॥७७॥

इस चञ्चल मन की अदृढ़ लीला है। यह कभी आकाश में जाता है, कभी पाताल में जाता है और कभी दशों दिशाओं में फिरता है। इधर-उधर तो इतना भटकता है ; पर, भूल कर भी, जहाँ जाना चाहिये वहाँ नहीं जाता। उसके पास ही अमृत का सरोवर है, उसे छोड़ कर सड़ी-गली नालियों में फिरता है। उसे सब जगह छोड़ कर अपने हृदय में ही बैठे हुए ब्रह्म के पास जाना चाहिये और हर समय उसकी ही विरक्तता करनी चाहिये ; इस से उसके पापों का नाश हो