भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २६० )

इसवास्ते मनुष्यो ! अनन्त, अजर, अमर, अविनाशी और शान्तिपूर्ण ब्रह्मका ध्यान करो । मिथ्या जन्मलालोमें क्या रक्खा है ? जो ब्रह्मका ज़रासा भी आनन्द पा जाते हैं, उनकी नज़रोंमें ससारी राजाओंका आनन्द तुच्छ जँचता है ॥७९॥

मतलब यह है कि लोगों को अनन्त, अजर, अमर, अविनाशी, शोक-रहित, शान्तिपूर्ण ब्रह्म का ध्यान करना चाहिये । उसी के ध्यान में पूर्णानन्द है ; संसार के भोग-विलासोंमें ज़रा भी आनन्द नहीं । वह आनन्द सदा है ; यह आनन्द क्षणिक है । उसमें सदा सुख है ; इसमें सदा दुःख है । जिनको ब्रह्मानन्द का ज़रासा भी मज़ा आ जाता है, वे त्रिलोकी के अधिपति के आनन्द को भी तुच्छ समझते हैं । राज, धन-दौलत और स्त्री-पुत्र प्रभृति सब उस परमात्माके पीछे हैं ; इसलिये इनको छोड़ कर उससे ही प्रीति करने में चतुराई है ।

दोहा ।

ब्रह्म अखण्डानन्द पर, सुमिरत क्यों न निशंक ।

जाके छिन्न-संसर्ग सों, लगत लोकपति रंक ? ॥७९॥

76. Therefore O men, meditate upon BRAHMA, the Endless, the Indestructible and the Blissfull. What is the

हे मनुष्य ! उस अखण्ड-पूर्ण ब्रह्म परमात्माको निःशङ्क होकर क्यों नहीं भजता, जिसके तृष्ण-भरके संसर्गसे बड़े-बड़े राजा-बादशाह भी तुच्छ भिखारीसे मालूम होते हैं ?