भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २५६ )

भय हो, कुटुम्बियोंमें स्नेह न हो, मनसे काम-विचार दूर हो और संसर्ग-दोषसे रहित होकर जंगलमें रहते हों ॥७५॥

परमात्मा में प्रेम होना, मनमें जन्म-मरण का भय होना, रिश्तेदारों से प्रेम न होना, मनमें स्त्रीको इच्छा का न उठना, एकान्तस्थानमें अकेले वन में निवास करना—ये ही तो वैराग्य के पूरे लक्षण हैं। इनसे अधिक वैराग्य के और लक्षण नहीं।

दोहा ।

मन विरक्त हरिभक्ति-युत, संगी वन तृणडाभ ।

याहूते कछु और है, परम अर्थको लाभ ? ॥७५॥

75. What greater renunciation should we wish for, if we have the following virtues,—Love of God, the fear of birth and death in our mind, no attachment with our relatives, no disturbance of Cupid's doing and residence in the lonely forest, free from the evils of society.

तस्मादनन्तमजरं परमं विकासि-

तद् ब्रह्म चिन्तय किमेभिरसद्विकल्पैः ॥

यस्यानुषंगिण इमे सुवनाधिपत्य-

भोगादयः कृष्णलोकमता भवन्ति ॥७६॥

मन विरक्त हो—संसारी विषय-भोगोंमें आसक्ति न हो, मनमें हरकी भक्ति हो और बनके वास-पात हमारे साथी-संगी हों—इससे उत्तम परमाय का लाभ और क्या होगा ?

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