वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 357, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५४ )
यदा मेहः श्रीमान्नपतति युगान्ताग्निनितः
समुद्राः शुष्यन्ति प्रचुरनिकराहानिलयाः ॥
धरा गच्छत्यन्तं धरणिधरपादैरपि धृता
शरीरिका वार्ता करिकलभकर्णग्रिचपले ॥७१॥
का
सिः
ता
धन
दुः
नव
मा
क
पा
का
जब प्रलयकालकी अग्निके मारे श्रीमान् सुमेरु पर्वत गिर पड़ता है ; मगर-मच्छोंके रहनेके स्थान समुद्र भी सूख जाते हैं ; पर्वतोंके पैरोसे दबी हुई पृथ्वी भी नाश हो जाती है ; तब हाथीके कानकी कोरके समान चञ्चल मनुष्यकी क्या गिन्ती ? ॥७१॥
जब काल सुमेरु जैसे पर्वतोंको जला कर गिरा देता है, महासागरोंको सुखा देता है, पृथ्वीको नाश कर देता है, तब इस छोटेसे चञ्चल मनुष्यकी क्या गिन्ती ? इसके नाश होने में कौनसा आश्चर्य ?
दोहा ।
मेरु गिरत सूखत जलधि, धरनि प्रलय हवै जात !
गजसुतके श्रुति चपल ल्यों, कहा देहकी बात ? ॥७२॥
मेरु=उमेरु पर्वत । जलधि=समुद्र । धरनि=पृथ्वी । प्रलय=नाश । गजसुत=हाथीका बच्चा । श्रुति=कान । चपल=चंचल । मेरु=बात=उमेरु गिर पड़ता है, समुद्र सूख जाता है और पृथ्वी नाश हो जाती है, तब हाथीके बच्चेके कानकी तरह चञ्चल देह किस गिन्तीमें है ?