भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २५३ )

तवही लग जीवो भलो, दीवो परे न धीम ।

विन दीवो जीवो जगत, हमें न रुचे ‘रहीम’ ॥

दीन या मुहताज सबकी तरफ देखता है, पर दोनकी तरफ कोई नहीं देखता । रहीम कहते हैं, जो दीनकी तरफ देखता है, वह दीनबन्धु भगवान् के समान होता है ।

रहीम कहते हैं, वे मनुष्य मर गये जो कहीं माँगने जाते हैं । उनसे पहले वे मरे, जिनके मुँहसे नाहीं निकलती है । मतलब यह है, माँगता तो मरा हुआ है ही, पर जो माँगने वालेको नहीं देता, वह उससे भी पहले मरा हुआ है ।

जीना तभी तक अच्छा है जब तक देना मन्द न हो । बिना दान किये जीना, रहीम कहते हैं, हमें अच्छा नहीं लगता ।

दोहा ।

गंगातट गिरिवर गुफा, उहाँ कहा चहि ठौर ? ।

क्यों एते अपमान सों, खात पराये कौर ? ॥७०॥

70. Have the grounds in the Himalaya mountains the stones of which are washed by the cold spray arising from water of the river Ganges and which are the favourite resort of Vidyadharas been destroyed, that men like to depend upon other people's charity, even when it is disrespectfully given ?

गिरिवर गुफा=पहाड़ोंकी गुफा । उहाँ=वहाँ । कहा=क्या । ठौर=जगह । एते=इतने । खात=खाता है । पराये कौर=पराये ठुकरे । क्या गंगाकिनारेके पहाड़ोंकी गुफाओंमें जगह नहीं रही, जो इतना अपमान सह कर पराये ठुकरे तोड़ता है ?

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