वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २५२ )
हूँवे अधीन चातक नहीं, शीश नाय नहीं लेय । ऐसे मानी मँगनहिं, को वारिद बिन देय ? ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—तीनों लोकोमें सिर्फ एक पपहिये का ही सिर ऊँचा है, क्योंकि उसने अपने स्वामी खातीके सिवा और किसीसे कभी दीनता नहीं की ।
पपहियेकी जाति ऊँची है; क्योंकि वह नदियों और तालाबों वगैरः जलाशयोंका पानी नहीं पीता । वह या तो धनश्यामसे यानी खाती नक्षत्रमें बाढ़लसे ही माँगता है अथवा दुःख भोगता है ।
पपहिया और मँगतोंकी तरह अधीन होकर और सिर नवाकर नहीं लेता । वह तो मानके साथ ही लेता है । ऐसे मानी मँगतेको बाढ़लके सिवा और कौन दे सकता है ?
जिनको परमात्माने देने-लायक बनाया है, उन्हें दिल खोल कर गरीब और मुहताजोंकी देना चाहिये । जो देते हैं, फिर पाते हैं और जो देते हैं उन्हींका जीवन सफल है । रहीम कवि कहते हैं:—
दोहा ।
दीनहि सबको लखत है, दीन लखे नहिं कोय । जो “रहीम” दीनहिं लखत, दीनबन्धु-सम सोय ॥ “रहियन” बे नर मर चुके, जे कई मँगन जाहिं । उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं ॥