वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २५१ )
स्थानानि किं हिश्वतः प्रलयं गतानि
यत्सावमानपरिण्डरता मनुष्याः ॥७०॥
हिमालय पर्वतकी वे चट्टानें जो गंगाजलकी लहरोंसे उठे हुए छाँटोंसे शीतल हो रही हैं और जहाँ जगह-जगह विद्याधर बैठे हैं क्या अब नहीं रही हैं, जो लोग अपमानसे मिले हुए पराये टुकड़ों पर गुजर करते हैं ? ॥७०॥
पराये टुकड़ों पर गुजर करनेकी अपेक्षा मर जाना भला है। अगर माँगना ही हो, तो माँगने की विधि चातक से सीखनी चाहिये। वह एक से ही माँगता है, दूसरेसे हर-गिज़ नहीं माँगता, चाहे मर क्यों न जाय, और माँगनेमें भी यह खूबी, कि वह कभी अधीन होकर नहीं माँगता, खिर नवाकर नहीं लेता। वह छोटोंसे नहीं माँगता; एक घन-श्याम ( बादल ) से ही माँगता है। चातकके समान याचक और वापिद ( बादल ) के समान दानी जगत्में कौन है ? जो ओछोंसे माँगते हैं, जने-जनेके पैर पकड़ते हैं, उनको चिकार है ! इसलिये मनुष्यों ! पपहिये की तरह एकमात्र घनश्याम से ही माँगो। महात्मा तुलसीदासजीने कहा है:—
“तुलसी” तीनों लोक मैं, चातक ही को माथ ।
सुनियत जासु न दीनता, किये दूसरो नाथ ॥
ऊँची जाति पीहरा, नीचो पियत न नीर ।
कै याचै घनश्याम सों, कै दुख सहे शरीर ॥