वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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क्षप्य ।
कहा कन्दराहीन भये, पर्वत भूतल से ?
भरना निर्जल भये कहा, जे पूरित जल से ?
कहा रहे सब वृक्ष, फूल-फल-बिन सुरभाये ?
सहे खलनके वैन, ग्रन्थता जो मद छाये ।
कर संचित धन जे स्वरूप हूँ; इत उत फेरें भू विकट ।
रे मन ! तू भूल न जाहु कई, इन खल पुरुषनके निकट ॥६६॥
69. Have the wild roots in the caves of mountains and the springs of water flowing out of rocks disappeared or the branches of trees bearing juicy fruits been destroyed, that people look supplicatingly towards the faces of proud and evil-minded persons, whose brows often contract with vanity owing to the little wealth, which they possess after having laboured hard for it ?
गंगातरंगकण्डीकरशीतलानि
विद्याभराध्युपितचारुशिलातलानि ॥
कन्दराहीन-बिना गुफाओंके । भूतल-पृथ्वी । निर्जल-बिना जलके । पूरित-भरे हुए । खलन-दुष्टों । वैन-बाते । कर संचित-इकट्टा करके । जे-जो । स्वरूप हूँ-थोड़ासा भी । इत उत-उधर उधर । भू-भौँ । भूल न जाहु-भूल कर भी न जा । क्या पर्वतोंमें गुफाये नहीं रही, क्या भरनोंका जल सूख गया, क्या वृक्षोंमें फल-फूल नहीं रहे, जो तू मदान्व दुष्टोंको तानेजती सहता है ? जो थोड़ासा भी धन सन्चय करके भौखोंको टेढ़ी करते हैं, उन दुष्टोंके पाँख है मन ! तू भूलकर भी मत जा ।