वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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71. When even the great Meru collapses, burnt away by the Mahapralaya fire,* when even the oceans which are the home of huge crocodiles and sharks are at last dried up and when the earth itself is destroyed although; it is held fast by the feet of great mountains, what should we say of the human body which is as shaky as the ear of an infant elephant?
एकाकी निःस्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिगम्बरः ॥
कदा शम्भो भविष्यामि कर्मनिर्मूलनक्षमः ॥७२॥
हे शिव ! मैं कब अकेला, इच्छा-रहित और शान्त हूँगा ? कब हाथ ही मेरा पात्र होगा और कब दिशायें मेरे वक्ष होंगे ? मैं कब कर्मोंकी जड़ उखाड़नेमें समर्थ हूँगा ? ॥७२॥
एकान्त वास करना, इच्छाओंको त्याग देना, शान्त रहना, हाथसे ही पानी वगैरः पीनेके बर्तनका काम लेना, दिशाओंको ही वस्त्र समझना ; यानी नम्र रहना और कर्मोंकी जड़ उखाड़नेमें समर्थ होना—ये ही कल्याणके मार्ग हैं। जिनमें ये गुण हैं, वे धन्य हैं और वे ही सच्चे सुखिया हैं।
दोहा ।
एकाकी इच्छा-रहित, पाणिपात्र दिगवस्त्र ।
शिव शिव ! हँ कब होऊँगो, कर्मशत्रुको शस्त्र ? ॥७२॥
- The fire at the time of universal destruction.
एकाकी = अकेला । इच्छा रहित = बिना इच्छाओंके । पाणिपात्र =