वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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72, O Shiva, when shall I be alone, desireless, peaceful, with hands only to be used as receptacles for water etc., with space only in place of garments and fit for exterminating the roots of Karma (actions) ?
पासाः श्रियः सकलकामदुधास्ततः किं
दत्तं पदं शिरसि विद्विषतां ततः किम् ॥
समानिताः प्रणयिनो विषवैस्ततः किम्
कल्पं स्थितं तदुभृतां तदुभित्ततः किम् ॥७३॥
जीर्णां कथा ततः किं सितममलपटं पटसुत्रं ततः किं
एका भायां ततः किं हयकरिसुगणैराड्रुतो वा ततः किम् ॥
भक्तं सुक्तं ततः किं कदशनमथ वा वासरोते ततः किं
व्यक्त ज्योतिर्निर्वातमथितभवभयं वैभवं वा ततः किम् ॥७४॥
अगर मनुष्योंको सब इच्छाओंके पूर्ण करनेवाली लक्ष्मी मिली तो क्या हुआ ? अगर शत्रुओंको पदानत किया तो क्या ? अगर धन से मित्रोंकी खातिर की तो क्या ? अगर इसी देहसे इस जगत्में एक कल्प तक भी रहे तो क्या ? ॥७३॥
अगर चिथड़ोंकी बनी हुई गुदड़ी पहनी तो क्या ? अगर निर्मल सफेद वस्त्र पहने या पीताम्बर पहने तो क्या ! अगर एक ही स्त्री
हाथका बतन । दिग् = दिशाएँ । वस्त्र = कपड़े । हौं = मैं । कर्म शत्रु = कर्म रूपी शत्रु का शस्त्र = काटने वाला डथियार ।