भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २५६ )

72, O Shiva, when shall I be alone, desireless, peaceful, with hands only to be used as receptacles for water etc., with space only in place of garments and fit for exterminating the roots of Karma (actions) ?

पासाः श्रियः सकलकामदुधास्ततः किं

दत्तं पदं शिरसि विद्विषतां ततः किम् ॥

समानिताः प्रणयिनो विषवैस्ततः किम्

कल्पं स्थितं तदुभृतां तदुभित्ततः किम् ॥७३॥

जीर्णां कथा ततः किं सितममलपटं पटसुत्रं ततः किं

एका भायां ततः किं हयकरिसुगणैराड्रुतो वा ततः किम् ॥

भक्तं सुक्तं ततः किं कदशनमथ वा वासरोते ततः किं

व्यक्त ज्योतिर्निर्वातमथितभवभयं वैभवं वा ततः किम् ॥७४॥

अगर मनुष्योंको सब इच्छाओंके पूर्ण करनेवाली लक्ष्मी मिली तो क्या हुआ ? अगर शत्रुओंको पदानत किया तो क्या ? अगर धन से मित्रोंकी खातिर की तो क्या ? अगर इसी देहसे इस जगत्में एक कल्प तक भी रहे तो क्या ? ॥७३॥

अगर चिथड़ोंकी बनी हुई गुदड़ी पहनी तो क्या ? अगर निर्मल सफेद वस्त्र पहने या पीताम्बर पहने तो क्या ! अगर एक ही स्त्री


हाथका बतन । दिग् = दिशाएँ । वस्त्र = कपड़े । हौं = मैं । कर्म शत्रु = कर्म रूपी शत्रु का शस्त्र = काटने वाला डथियार ।