भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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रही तो क्या ? अगर अनेक हाथी-घोड़ों सहित अनेकों ख़ियाँ रहीं तो क्या ? अगर नाना प्रकारके व्यञ्जन भोजन किये अथवा शामको मामूली खाना खाया तो क्या ? चाहे जितना विभव पाया, पर यदि संसार-वन्धनको मुक्त करनेवाली आत्मज्ञानकी ज्योति न जानी, तो कुछ भी न पाया और कुछ भी न किया ॥७४॥

मतलब यह है, सारे संसारके राज्य-वैभव अथवा त्रिभुवन के अधिपति होनेमें भी जो आतन्त्र नहीं है, वह आत्मज्ञान या ब्रह्मज्ञानमें है । आत्मज्ञान होनेसे ही मनुष्य, जीवन-मरणके कष्टसे छुटकारा पाकर, परम शान्ति-लाभ करता है ।

अर्ब सर्व लो द्रव्य है, उदय अस्त लो राज ।

जो तुलसी निज मरन है, तौ आवे केहि काज ॥

अगर अरब-खरब तक धन हो और उद्याचलसे अस्ताचल तक राज हो, तोभी अगर अपना मरण हो, तो ये सब किस कामके ? धन-दौलत और राजपाट सब जीते रहने पर काम आते हैं, मरने पर इनसे कोई लाभ नहीं ।

दोहा ।

इन्द्र भये धनपति भये, भये शत्रु के साल ।

कल्प जिऐ तौऊ गये, अन्त कालके गाल ॥७४॥

इन्द्र = देवताओंका राजा । धनपति = धनेश, कुबेर । कल्प = ब्रह्मा का एक दिन, जो हमारे ४३२०००००००० बरसोंके बराबर होता है । अगर

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