भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २६८ )

सोहत चन्द चिराग, बीजना करत दशोंदिशि ।

बनिता अपनी वृत्ति, संगही रहत दिवस-निशि ॥

अतुल अपार सम्पत्ति सहित, सोहत है सुखमें मगन ।

मुनिराज महानुपराज ज्यों, पौड़े देखे हम हगन ॥७६॥

79. A sage sleeps in comfort and peace like a great king on the most comfortable sofa of the earth, with the soft pillow made of his own arm under his head, with the open sky above as his bed-cover, the congenial breeze serving him as a fan, the moon giving him the light of a lamp, enjoying the conjugal association of non-attachment with pleasures of life.

त्रैलोक्याधिपतित्वमेव विरसं यस्मिन्महाशासने

तल्लब्ध्वासनवस्त्रमानघटने भोगे रतिं मा कृथाः ॥

भोगः कोऽपि स एक एव परमो नित्योदितो जृम्भते

यत्त्वादाद्विरसा भवन्ति विषयास्त्रैलोक्यराज्यादयः ॥८०॥

हे आत्मा ! अगर तुम्हे उस ब्रह्मका ज्ञान होगाया है, जिसके सामने तीन लोकका राज्य तुच्छ मालूम होता है ; तो तू भोजन, वस्त्र और मानके लिए भोगोंकी चाहना मत कर ; क्योंकि वह भोग सर्वश्रेष्ठ और नित्य है ; उसके मुकाबलेमें त्रिलोकीके राज्य प्रभृति सुख कुछ भी नहीं हैं ॥८०॥

हे । बीजना = पंखा । बनिता = स्त्री । पौड़े देखे = सोते हुए देखे ।

हगन = आँखोसे ।